श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 4: वैकुण्ठ (आध्यात्मिक जगत)  »  श्लोक 49
 
 
श्लोक  2.4.49 
कदाचित् स्वर्ण-रत्नादि-
मयं तत् तत् प्रतीयते
कदाचिच् च घनी-भूत-
चन्द्र-ज्योत्स्नेव कक्खटी
 
 
अनुवाद
कभी वह स्थान सोने और जवाहरात जैसी सम्पदा से भरा हुआ प्रतीत होता है, और कभी उसका वातावरण चाक-सा सफेद, चांदनी के घने संघनन जैसा प्रतीत होता है।
 
Sometimes the place appears to be filled with riches like gold and jewels, and sometimes its atmosphere appears chalk-white, like a dense condensation of moonlight.
तात्पर्य
वैकुण्ठ के वातावरण के अंतहीन विविध आकर्षणों को अभी भी मंद रूप से प्रतिबिंबित करने वाले सोना, गहना, चाँदनी भौतिक संसार में सबसे बड़े आकर्षणों में से हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)