वैमानिकाः स-ललनाश् चरितानि शश्वद्
गायन्ति यत्र शामल-क्षपणानि भर्तुः'।
अन्तर्जलेऽनुविकसन्-मधु-माधवीनां
गन्धेन खण्डित-धियोऽप्यनिलं क्षिपन्तः।
"वैकुण्ठ ग्रहों में निवासी अपने हवाई जहाज में अपनी पत्नियों के साथ उड़ते हैं, और सदैव भगवान् के चरित्र और गतिविधियों का गायन करते हैं, जो हमेशा सभी अशुभ गुणों से रहित होते हैं। भगवान की महिमा गाते हुए, वे पानी में खिलते माधवी फूलों की उपस्थिति का भी उपहास करते हैं, जो सुगंधित और शहद से लदी होती हैं।" दूसरे शब्दों में, भले ही आनंदपूर्वक आनंद ले रहे हों, वैकुण्ठ के भक्त हमेशा भगवद व्यक्तित्व की पूजा के परमानंद में लीन रहते हैं। माधवी फूल वसंत ऋतु में खिलता है, जब इंद्रिय सुख का आकर्षण चरम पर होता है। फिर भी भले ही ऐसे आकर्षण भक्तों की इंद्रियों को उत्तेजित कर सकते हैं, लेकिन यह उन्हें उनकी भक्ति सेवा से बिल्कुल भी विचलित नहीं करता है।
यत्संकुलं हरि-पदानति-मात्र-दृष्टैर्
वैदूर्य-मारकट-हेम-मयैर्विमानैः।
येषां बृहत्-कटि-टटाः स्मित-शोभि-मुख्यः
कृष्णात्मनां न रज आदधुर उत्स्मयाद्यैः।
"वैकुण्ठ भक्तों से भरा है जो ऐसा लगता है कि भगवान हरि के चरणों में झुकने के अलावा कुछ नहीं करते हैं। यद्यपि लापीस लाजुली, पन्ना और सोने से बने अपने हवाई जहाज में यात्रा करते समय वे अपने पति-पत्नी से घिरे रहते हैं, जिनके बड़े कूल्हे और सुंदर मुस्कुराते हुए चेहरे होते हैं, वे वैकुण्ठ निवासी ऐसे मस्ती और सुंदर आकर्षण से जुनून को उत्तेजित नहीं कर सकते हैं।" कर्मी, ज्ञानी और योगी वैकुण्ठ के भक्तों जैसे इंद्रिय संतुष्टि के लिए कुछ भी प्राप्त करने की उम्मीद नहीं कर सकते हैं। हालाँकि, यह सभी आनंद वैकुण्ठ भक्तों को शुद्ध अच्छाई के भाव से कभी नहीं गिराता है, क्योंकि वे भगवान नारायण की प्रेममयी सेवा में पूर्ण रूप से निश्चित हैं।
