श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 4: वैकुण्ठ (आध्यात्मिक जगत)  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  2.4.39 
एतत्-परम-वैचित्री-
हेतुं वक्ष्यामि ते ’ग्रतः
कृष्ण-भक्ति-रसास्वाद-
वतां किं स्यान् न सुन्दरम्
 
 
अनुवाद
बाद में मैं तुम्हें इस अतिशय विविध स्वरूपों का कारण समझाऊँगा। जो लोग कृष्ण भक्ति के भावों का आनंद लेते हैं, उनके लिए क्या कोई ऐसी चीज़ है जो सुंदर न हो?
 
Later I will explain to you the reason for this immense variety of forms. For those who enjoy the sentiments of Krishna devotion, is there anything that is not beautiful?
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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