ततः शोकम् इवामुत्राप्य्
आप्नुवन् श्री-हनूमतः
श्री-रामचन्द्र-पादाब्ज-
महिम्नां श्रवणेन हि
साक्षाद्-अनुभवेनापि
मनो-दुःखं निवारये
तस्मिन् निजेष्ट-देवस्य
सर्वम् आरोपयामि च
अनुवाद
इस प्रकार अयोध्या में भी मैं दुःखी प्रतीत हो रहा था। किन्तु हनुमानजी से श्रीरामचन्द्र के चरणकमलों की महिमा सुनकर और स्वयं भगवान राम के दर्शन करके, मेरा वह मानसिक क्लेश दूर हो गया। मैंने भगवान रामचन्द्र में अपने आराध्य देव के सभी गुण धारण करने की कल्पना की।
Thus, I felt sad even in Ayodhya. But after hearing from Hanumanji about the glories of Lord Rama's lotus feet and seeing Lord Rama himself, my mental anguish dissipated. I imagined Lord Rama possessing all the qualities of my beloved deity.
तात्पर्य
अयोध्या में गोप-कुमार ही एक ऐसे चरित्र थे, जो अप्रसन्न (शोकमिव...आप्लुवन) दिखते थे। हालाँकि, उनके चेहरे का यह शोक वास्तव में ईश्वर के प्रति अथाह प्रेम का परिणाम था। और वास्तव में वही उनका अद्वितीय आध्यात्मिक आनंद था। हनुमान द्वारा भगवान राम की विनम्रता, सादगी, आदर और अन्य उत्कृष्ट गुणों का वर्णन सुनकर, गोप-कुमार आश्चर्यचकित रह जाते थे। वे अपने मदन-गोपाल में भगवान रामचंद्र के गुणों और रूप की झलक देखकर, उन पर अत्यधिक स्नेह करते थे।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥