श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 4: वैकुण्ठ (आध्यात्मिक जगत)  »  श्लोक 267
 
 
श्लोक  2.4.267 
गोप-बालक-वेशेन
स्वकीयेनैव पूर्व-वत्
कियन्तं न्यवसं कालं
तत्रानन्द-भरार्दितः
 
 
अनुवाद
मैं कुछ देर तक वहाँ रहा, पहले की तरह ही ग्वाले के वेश में। और जो आनंद मैंने चखा, उससे मेरा हृदय पिघल गया।
 
I stayed there for a while, disguised as a cowherd as before. And the joy I tasted melted my heart.
तात्पर्य
जिस प्रकार वह वैकुण्ठ में कुछ समय भगवान नारायण की सेवा में पंखा झलते और झूला झुलाते हुए कर चुका था, इसी तरह गोप-कुमार ने अब कुछ समय अयोध्या में भगवान रामचंद की सेवा कर दी। परन्तु जब गोप-कुमार का उद्देश्य तो द्वारिका जाने का था तो वह अयोध्या में क्यों रह गयें? यह इसलिए हुआ कि भगवान रामचंद्र के चरणों में सहज आनंद में मदमस्त होकर वह सम्मोहित हो गए और सब कुछ भूल गये।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)