भगवान बोले: मेरे प्यारे ग्वालपुत्र, मेरे परम मित्र, शाबाश! शाबाश! इतना स्नेह दिखाकर तुमने मुझे जीत लिया। बहुत हो गया इतना परिश्रम। अब बस आराम करो। तुमने मुझे, अपने प्रिय मित्र को, बहुत समय तक दुखी रखा है।
The Lord said: "My dear cowherd's son, my best friend, well done! Well done! You have won me over by showing so much affection. Enough of this hard work. Now just rest. You have kept me, your dear friend, unhappy for too long."
तात्पर्य
इन शब्दों से भगवान रामचंद्र अयोध्या में विजयी प्रवेश के लिए गोप-कुमार को बधाई देते हैं। भगवान बार-बार (साधु साधु) कहते हैं कि अपनी खुशी को बताते हैं। वह मानते हैं कि लंबी यात्रा थका देने वाली रही होगी, इसलिए वह गोप-कुमार से कहते हैं कि थोड़ी देर के लिए आराम कर लें। और शायद गोप-कुमार लंबे समय तक अयोध्या में रह सकते हैं। किसी भी मामले में, कम से कम उसे इतने अनावश्यक दंडवत और प्रार्थना करने से विराम लेना चाहिए। श्रद्धा के ये प्रदर्शन भगवान को पीड़ा देते हैं, जो गोप-कुमार को अपना घनिष्ठ मित्र मानते हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥