वहाँ जाकर भगवान का संकीर्तन करो, जैसा कि वर्णित है, और अंततः तुम अपने प्रिय भगवान को देखोगे, जिनके दर्शन की तुम इतने समय से इच्छा कर रहे थे - वे मनोहर श्री कृष्णचन्द्र हैं, जो यदुओं से घिरे हुए हैं।
Go there and chant the Lord's name as described, and you will finally see your beloved Lord, whose darshan you have been longing for so long—He is the beautiful Sri Krishnachandra, surrounded by the Yadus.
तात्पर्य
अब नारद गोप-कुमार को और अधिक आश्वस्त करते हैं कि द्वारका में कृष्ण वही मदन-गोपाल हैं जिन्हें वह इतने लंबे समय से खोज रहे हैं। प्रश्न यह नहीं है कि क्या द्वारका जाने के लिए जगह है, बल्कि केवल यह है कि वहाँ जल्द से जल्द कैसे पहुँचा जाए। उस प्रश्न का उत्तर भी यहाँ नारद देते हैं: गोप-कुमार को श्री कृष्णचंद्र का संकीर्तन करना चाहिए, ज़ोर से और मधुरता से उनके नामों का गायन करना चाहिए, उनकी महिमा का पाठ करना चाहिए और उन्हें प्रार्थनाएँ अर्पित करनी चाहिए। यह सब कैसे करें, यह वैदिक साहित्य में व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत किया गया है। और गोप-कुमार को यह आश्चर्य नहीं करना चाहिए कि अपने आराध्य भगवान को देखने पर उन्हें कैसे पहचाना जाए, क्योंकि भगवान, भक्त का शाश्वत स्वामी, अपनी महिमा को अपने आश्रित से हमेशा के लिए छिपा कर नहीं रखेगा। या वैकल्पिक रूप से यह हो सकता है कि नारद, गोप-कुमार को धर्मग्रंथों के आदेशों का यांत्रिक रूप से पालन करने के बजाय, अपने हृदय की आज्ञा सुनकर भक्ति सेवा की रागानुगा पद्धति का अनुसरण करने की सलाह दे रहे हैं। किसी भी मामले में, सर्वोच्च भगवान सर्व-शक्तिशाली हैं, इसलिए किसी न किसी तरह से वे भक्त जो भगवान के नामों का संकीर्तन करते हैं, वे अपनी सभी महत्वाकांक्षाओं को आसानी से पूरा कर लेंगे।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥