| श्री बृहत् भागवतामृत » खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य » अध्याय 4: वैकुण्ठ (आध्यात्मिक जगत) » श्लोक 229 |
|
| | | | श्लोक 2.4.229  | सप्रेम-भक्तेः परिपाकतः स्यात्
काचिन् महा-भाव-विशेष-सम्पत्
सा वै नरीनर्ति महा-प्रहर्ष-
साम्राज्य-मूर्धोपरि तत्त्व-दृष्ट्या | | | | | | अनुवाद | | शुद्ध प्रेम में भक्ति की अंतिम परिपक्वता में, कभी-कभी एक अद्वितीय निधि प्रकट होती है—महाभाव, परमानंद की सर्वोच्च अवस्था। सत्य के दर्शन से, मनुष्य उसे परम आनंद के राज्य में देखता है, जहाँ वह प्राचीरों पर उल्लासपूर्वक नृत्य करता है। | | | | In the final maturation of devotion into pure love, a unique treasure sometimes manifests—mahabhava, the highest state of ecstasy. With the vision of the Truth, man sees Him in the realm of supreme bliss, where He dances ecstatically on the ramparts. | | ✨ ai-generated | | |
|
|