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श्लोक 2.4.224  |
नापि तत्र सहन्ते ते
विलम्बं लव-मात्रकम्
भगवान् अपि तान् हातुं
मनाग् अपि न शक्नुयात् |
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| अनुवाद |
| वे भक्त उस फल को प्राप्त करने में एक क्षण का भी विलम्ब सहन नहीं कर सकते, न ही भगवान् ऐसे भक्तों की एक क्षण के लिए भी उपेक्षा कर सकते हैं। |
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| Those devotees cannot tolerate even a moment's delay in attaining that fruit, nor can the Lord ignore such devotees even for a moment. |
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