श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 4: वैकुण्ठ (आध्यात्मिक जगत)  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  2.4.21 
अत्रादृष्टाश्रुताश्चर्य-
समुद्रोर्मि-परम्पराम्
भगवद्-भक्ति-दीप्ताभ्यां
नेत्राभ्यां गणय स्थिरः
 
 
अनुवाद
शांत रहें, और प्रभु के प्रति भक्ति से प्रकाशित अपनी आंखों से यहां बहते हुए अद्भुत सागर की लहरों को गिनें, एक के बाद एक, ऐसे अद्भुत आश्चर्य जिन्हें आपने पहले कभी न देखा है और न ही सुना है।
 
Be still, and with your eyes illuminated by devotion to the Lord, count the waves of the wonderful ocean flowing here, one after another, such wonderful wonders as you have never seen or heard before.
तात्पर्य
गोप-कुमार के अनुरक्षकों को देखने को मिला कि वह अपने प्रभु से दूर रखने की स्थिति से दुखी हो रहा है। इसलिए उन्होंने उसे तसल्ली देने के लिए, उसके दिमाग को शांत करने और उसकी आँखों को उसके सामने से गुजरने वाले आश्चर्यों की गिनती के काम में व्यस्त रखने के लिए हल्की सलाह दी। वैकुंठ के गोपुरा में अपने छोटे से इंतजार के दौरान देखे गए कई आश्चर्यजनक चीज़ों से वह प्रभु वैकुंठ-नाथ के विशिष्ट वैभवों के बारे में कुछ सीख सकेगा, और इससे प्रभु के दर्शन के लिए उसके जल्दबाज़ी को और मज़बूती मिलेगी। वह विस्मय और श्रद्धा से सर्वोच्च प्रभु की पूजा करने के तरीकों के बारे में सीख सकेगा। और इसके अलावा इंतजार के दौरान हासिल किया गया अनुभव उसे प्रभु नारायण का सेवक बनने के कई लाभों के बारे में कुछ सिखायेगा। इस तरह प्रवेशद्वार में बिताया उसका छोटा सा समय उत्पादक साबित होगा। गोप-कुमार के परिचारक मजाक कर रहे थे जब उन्होंने उसे देखी जाने वाली अद्भुत चीज़ों की गिनती करने के लिए कहा, जो कि समुद्र में लहरों की गिनती से कठिन काम था। "मेरी आँखों में यह करने की शक्ति कैसे आ जाएगी?" गोप-कुमार पूछ सकता था। इस प्रश्न की आशा करते हुए, वैकुण्ठ के दूतों ने उसे बताया कि उसकी आँखें भगवद्-भक्ति द्वारा प्रकाशित की जाएंगी।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)