मत्-कर्म कुर्वतां पुंसां
क्रिया-लोपो भवेद् यदी
तेषां कर्माणि कुर्वन्ति
त्रिस्रः कोट्यो महर्षयः
"यदि मेरे प्रति भक्ति सेवा करने वाले व्यक्ति अपने कुछ कर्म कर्तव्यों को करने में विफल रहते हैं, तो तीस मिलियन महान ऋषि उनकी ओर से उन दायित्वों को पूरा करते हैं।" (पद्म पुराण)
संतों की सामान्य राय यह है कि सर्वशक्तिमान भगवान के विग्रह की भक्तिमय पूजा सदैव प्रशंसनीय है। और श्रेष्ठ वैष्णव आचार्य विग्रह पूजा को विशुद्ध भक्ति सेवा की एक प्रमुख गतिविधि मानते हैं। भक्ति शब्द का प्राथमिक अर्थ सेवा है, और विग्रह पूजा के रूप में भगवान की सेवा में भक्ति-योग की सभी विधियों के तत्व शामिल हैं। यह पूजा मानव प्रयास की चार सामान्य श्रेणियों में उपलब्धियों से कहीं आगे, जीवन की सर्वोच्च सिद्धि की ओर ले जाती है।
