श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 4: वैकुण्ठ (आध्यात्मिक जगत)  »  श्लोक 205
 
 
श्लोक  2.4.205 
ततः कथं पुराणेभ्यः
श्रूयन्ते तत्-तद्-उक्तयः
अप्रमाणं च ता न स्युर्
महन्-मुख-विनिःसृताः
 
 
अनुवाद
"लेकिन फिर, हम पुराणों में इस विषय में भिन्न-भिन्न मत क्यों सुनते हैं? पौराणिक कथन, जो महान आत्माओं के मुख से निकलते हैं, प्रामाणिक से कम नहीं हो सकते।"
 
"But then, why do we hear different opinions on this subject in the Puranas? The mythological statements, which come from the mouths of great souls, can be nothing less than authentic."
तात्पर्य
श्रीमद् भागवत और अन्य पुराणों में ऐसे कथन दीए गए हैं जो कि स्पष्ट रूप से देवता पूजन के महत्व को तुच्छ समझते हैं। उदाहरण के लिए:

अर्चायाँ एव हरये

पूजाँ यः श्रद्धयते हते

न तद्-भक्तेषु चान्येषु

स भक्तः प्रकृतः स्मृतः

"वह भक्त जो ईमानदारी से मंदिर में देवता की पूजा करता है लेकिन अन्य भक्तों या आम लोगों के साथ ठीक से व्यवहार नहीं करता उसे प्रकृत-भक्त, एक भौतिक पर आधारित भक्त, कहा जाता है और उसे सबसे नीची श्रेणी में माना जाता है।" (भागवतम 11.2.47)

यो माँ सर्वेषु भूतेषु

संतम् आत्मानं ईश्वरम्

हित्वर्चाँ भजते मौढयात्

भस्मनि एव जुहोति सः

"वह व्यक्ति जो मंदिरों में देवता की पूजा तो करता है लेकिन नहीं जानता कि सर्वोच्च भगवान, परमात्मा के रूप में, हर जीवित इकाई के हृदय में स्थित हैं, को अज्ञानी होना चाहिए और उसकी तुलना उस व्यक्ति से की जाती है जो राख में भेंट चढ़ाता है।" (भागवतम 3.29.22)

अहम् उच्चावाचैर द्रव्यैः

क्रियायोत्पन्नयानघे

नैव तुष्ये 'र्चितो 'र्चायाँ

भूत-ग्रामावमानिनाः

"मेरी प्रिय माँ, अगर मेरे एक भक्त ने बहुत ही शुद्ध और विधिवत रूप से मेरी पूजा की है तब भी, अगर वह सभी जीवित इकाइयों में मेरी उपस्थिति से अनजान है, तो वह मंदिर में मेरे देवताओं की पूजा करके मुझे कभी भी खुश नहीं कर सकता।" (भागवतम 3.29.24)

प्रतिमा मंद-बुद्धिनां जैसे शास्त्र के यह और भी बहुत सारे कथन, महान ऋषियों के मुँह से निकले हैं। और ऊपर लिखे गए श्लोक स्वयं सर्वोच्च भगवान के शब्द हैं, जो कि श्री शुकदेव के मुँह से सुनाए गए हैं। सिद्धांत के एक मामले के रूप में, विश्वसनीय अधिकारियों के शब्दों, जैसे कि भगवान और उनके पवित्र भक्त, को सत्य के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए। इसलिए गोप-कुमार को हैरानी हो रही है। कोई भी जानकार व्यक्ति निश्चित रूप से इस बात से सहमत होगा कि भगवान के देवता रूप, जैसे कि श्री संकर्षण और अन्य जो कि भूलोक के विभिन्न वर्षों पर प्रकट होते हैं, जिनमें पृथ्वी पर अपने दिव्य शहरों में श्री रंगनाथ और जगन्नाथ के देवता शामिल हैं, वो सीधे तौर पर ईश्वर के व्यक्तित्व हैं और विश्वास के साथ उनकी पूजा की जानी चाहिए। लेकिन प्रतिमा ("छवि") और अर्चा ("पूजनीय देवता") शब्दों का उपयोग अक्सर शास्त्र में अपरिपक्व भक्तों की संकीर्ण दृष्टि की आलोचना करने के लिए किया जाता है, और ये सर्वोच्च भगवान के विशेष अवतार-संकर्षण, रंगनाथ और जगन्नाथ - भी खुद को प्रतिमा और अर्चा के रूप में प्रकट करते हैं। क्या इसका मतलब यह है कि वे निम्न रूप हैं? गोप-कुमार को उम्मीद है कि नारद इस संदेह को दूर करेंगे।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)