श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 4: वैकुण्ठ (आध्यात्मिक जगत)  »  श्लोक 202
 
 
श्लोक  2.4.202 
श्री-गोप-कुमार उवाच
पृष्टं मयेदं भगवन् धरा-तले
तिष्ठन्ति याः श्री-प्रतिमा महा-प्रभोः
ताः सच्-चिद्-आनन्द-घनास् त्वया मता
नीलाद्रि-नाथः पुरुषोत्तमो यथा
 
 
अनुवाद
श्रीगोपकुमार ने कहा: तब मैंने पूछा, "हे प्रभु, पृथ्वी पर नीलाद्रि के स्वामी भगवान पुरुषोत्तम के समान परम भगवान के दिव्य विग्रह रूप विद्यमान हैं, और आप उन्हें शाश्वतता, ज्ञान और आनंद का अवतार मानते हैं।
 
Sri Gopakumara said: Then I asked, “O Lord, there exists on earth the transcendental form of the Supreme Lord, like Lord Purushottam, the Lord of Niladri, and You consider Him to be the embodiment of eternity, knowledge and bliss.
तात्पर्य
गोपा-कुमार आराधना, भगवान की पूजा की भक्तिमय प्रक्रिया से बहुत आकर्षित हैं। उन्होंने जगतनाथ-पुरी और ब्रह्मांड के कई उच्च ग्रहों पर आराधना के लाभों का आनंद लिया है। उन्होंने विभिन्न आधिकारिक शास्त्रों से इस प्रक्रिया की महिमा के बारे में भी सुना है। हालाँकि, नारद ने गोपा-कुमार में यह कहकर संदेह पैदा किया है कि भगवान के देवता एक अन्य प्रकार के अवतार हैं, जो अन्य अवतारों से अप्रभेद्य हैं। इस अध्याय में पहले (छंद 155 और 157), नारद ने कहा था:

यथा धरांलम्बन-रत्न-भूता

नारायणो 'सौ स नरो 'थ दत्तः

श्री-जामदग्न्यः कपिलादयो 'पि

ये कौतूकाच्च प्रतिमा-स रूपाः

ये स्वर्ग-लोकादिषु विष्णु-यज्ञेश-

वरादयो 'मी भवतैव दृष्टाः

मत्स्यो 'थ कूर्मश्च महा-वराहः

श्रीमन्-नृसिंहो ननु वामनश्च

अन्ये 'वताराश्च तथैव तेषां

प्रत्य-एकम् ईहाभिधया प्रभेदाः

ते सच्-चित्-आनन्द-घना हि सर्वे

नानात्व-भावो 'पि सदाएक-रूपाः

"ऐसे भी लोग हैं जो चंचलता से देवताओं की उपस्थिति ग्रहण करते हैं.... भगवान के ये प्रत्येक रूप की अपनी गतिविधियाँ और नाम होते हैं, फिर भी ये सभी पूर्ण रूप से अनंत काल, ज्ञान और आनंद में हैं। विविधता प्रकट करने के बावजूद, पदार्थ में वे हमेशा एक और एक ही होते हैं।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)