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श्लोक 2.4.193  |
तारतम्यं तु कल्प्येत
स्व-स्व-सेवानुसारतः
तत्-तद्-रस-सजातीय-
सुख-वैचित्र्य्-अपेक्षया |
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| अनुवाद |
| भक्तों के बीच पदानुक्रम की कल्पना केवल उनकी अपनी सेवा के स्वरूप के अनुसार तथा प्रत्येक भक्त को भगवान के साथ अपने रिश्ते से प्राप्त होने वाली खुशी के अनुसार की जाती है। |
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| The hierarchy among devotees is conceived solely according to the nature of their respective service and the happiness each devotee derives from his relationship with the Lord. |
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