श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 4: वैकुण्ठ (आध्यात्मिक जगत)  »  श्लोक 190
 
 
श्लोक  2.4.190 
विचित्र-लीला-विभवस्य तस्य
समुद्र-कोटी-गहनाशयस्य
विचित्र-तत्-तद्-रुचि-दान-लीला-
विभूतिम् उत्तर्कयितुं प्रभुः कः
 
 
अनुवाद
भगवान की लीलाएँ असीम विविधता में विस्तृत हैं। उनका मन करोड़ों सागरों से भी गहरा है। उनकी विविध लीलाओं का ऐश्वर्य उनके भक्तों को अनेक प्रकार से अपनी ओर आकर्षित करता है। उन्हें चिन्तन द्वारा कौन समझ सकता है?
 
The Lord's pastimes are infinitely diverse. His mind is deeper than millions of oceans. The splendor of His various pastimes attracts His devotees in many ways. Who can understand them through contemplation?
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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