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श्लोक 2.4.19  |
सोमं शिवं तत्र मुदा प्रणम्य
तेनादर-प्रेम-सद्-उक्ति-जालैः
आनन्दितो वाक्य-मनो-दुराप-
माहात्म्य-मालं तम् अगां विकुण्ठम् |
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| अनुवाद |
| वहाँ मैंने भगवान शिव और उमा को बड़े आनंद से प्रणाम किया, और उन्होंने प्रेम और आदर से परिपूर्ण कृपापूर्ण वचनों की वर्षा से मुझे आनंदित कर दिया। और फिर मैं उस स्थान पर चला गया, जिसकी महिमा की माला को न तो वाणी से छुआ जा सकता है और न ही मन से - वैकुंठ। |
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| There I bowed down to Lord Shiva and Uma with great joy, and they showered me with kind words filled with love and respect. And then I departed for the place whose glory cannot be touched by words or mind—Vaikuntha. |
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