श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 4: वैकुण्ठ (आध्यात्मिक जगत)  »  श्लोक 181
 
 
श्लोक  2.4.181 
अष्टमावरणस्याधि-
ष्ठात्री मूर्तिमती हि या
कार्याकार-विकारस्या-
प्राप्त्या प्रकृतिर् उच्यते
 
 
अनुवाद
साक्षात् प्रकट होकर, वह ब्रह्मांड के आठवें आवरण की अधिष्ठात्री हैं। चूँकि भौतिक सृष्टि के परिवर्तन उन पर प्रभाव नहीं डालते, इसलिए उन्हें प्रकृति कहा जाता है।
 
Manifested in person, she is the presiding deity of the eighth sheath of the universe. Since the changes of the material world do not affect her, she is called nature.
तात्पर्य
पदार्थ हमेशा बदलता रहता है, एक स्थिति से दूसरी स्थिति में परिवर्तित होता रहता है। परन्तु क्योंकि माया पदार्थ के इस निरंतर परिवर्तन की अधीक्षक होती है, वह स्वयं कभी भी परिवर्तन के अधीन नहीं होती है। इस प्रकार उसे प्रकृति कहते है, भौतिक अस्तित्व का मौलिक रूप, परिवर्तनशीलता का अपरिवर्तनीय आंतरिक आधार, जो बदलता है। संक्षेप में, परिवर्तन का कारण अपरिवर्तनीय है। इसलिए जब गोप-कुमार ने ब्रह्माण्ड के आठवें आवरण के भीतर माया के निवास में उनकी यात्रा की, तो उन्होंने स्वयं को भगवान की आध्यात्मिक ऊर्जा से भिन्न नहीं बताया, जिसकी वे एक पृथक विस्तार हैं:

भक्तमिच्छसि वा विष्णो

तथाप्येतस्य चेटिकां

भगिनीं शक्ति-रूपां माम्

कृपया भज भक्ति-दाम

अर्थात, "या यदि आप विष्णु के प्रति भक्ति चाहते हैं, तब भी आपको दयालु होना चाहिए और मुझे पूजा करना चाहिए, जो भक्ति प्रदान करती हूँ, क्योंकि मैं उनकी दासी हूँ, उनकी बहन हूँ और उनकी ऊर्जा का अवतार हूँ।" (बृहद-भागवतामृत २.३.२८)

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)