श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 4: वैकुण्ठ (आध्यात्मिक जगत)  »  श्लोक 177
 
 
श्लोक  2.4.177 
सा च तस्याश् च सा चेष्टा
ज्ञेया तच्-छुद्ध-सेवकैः
अतर्क्या शुष्क-दुस्तर्क-
ज्ञान-सम्भिन्न-मानसैः
 
 
अनुवाद
भगवान के शुद्ध सेवक उसे और उसके कार्यों को समझते हैं। किन्तु जिनका मन कुतर्क से उत्पन्न शुष्क ज्ञान से भ्रमित है, वे यह नहीं समझ पाते कि वह क्या है।
 
The Lord's pure servants understand Him and His works. But those whose minds are bewildered by dry knowledge born of sophistry cannot grasp what He is.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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