यदरचितं ब्रह्मा-भवदिभिः सुरैः
श्रया च देव्या मुनिभिः सा-सात्वतैः
"भगवान के चरण कमलों की पूजा ब्रह्मा, शिव और अन्य सभी देवताओं के द्वारा, देवी लक्ष्मी के द्वारा और महान ऋषियों और वैष्णवों के द्वारा की जाती है।" ऐसे वक्तव्य बताते हैं कि सर्वोच्च भगवान के उपासकों के बीच उनकी मुक्त ऋषियों और पवित्र वैष्णवों से भी अधिक इज्जत की जाती है। फिर क्यों कभी-कभी उनकी भौतिक और नीची के रूप में आलोचना की जाती है? इस श्लोक और अगले श्लोक में, नारद इस शंका का समाधान करते हैं। देवी लक्ष्मी के कई विस्तारों में से, एक लक्ष्मी हैं, जो भौतिक संसार के सभी ऐश्वर्यों की अध्यक्ष हैं। ब्रह्मांड के सभी निवासी, विभिन्न ग्रहों के शासकों सहित, अपनी शक्तियां उन्हें से ऋणी हैं। यहां तक कि योगियों की रहस्यमयी सिद्धियां भी उनसे आती हैं। मुमुक्षु (मुक्ति के लिए संघर्षरत व्यक्ति) और मुक्त (जो लोग पहले ही मुक्ति प्राप्त कर चुके हैं) लक्ष्मी के इस खास स्वरूप की अवहेलना करते हैं क्योंकि वह जो ऐश्वर्य प्रदान करती हैं, वह इंद्रियों की संतुष्टि के लिए प्रयोजन से अधिक कुछ नहीं होता है, जो कि सच्चे मुमुक्षुओं और मुक्तों के लिए बिल्कुल भी आकर्षक नहीं है। सांसारिक इंद्रिय सुखों में उलझना मुक्ति की प्रमुख बाधा है।
