श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 4: वैकुण्ठ (आध्यात्मिक जगत)  »  श्लोक 170
 
 
श्लोक  2.4.170 
या महा-सिद्धिवत् तासु
सर्व-सम्पद्-अधीश्वरी
मुमुक्षु-मुक्त-भक्तानाम्
उपेक्ष्या सैव भूति-दा
 
 
अनुवाद
लक्ष्मी के उन अंशों में समस्त भौतिक ऐश्वर्य की नियंत्रक देवी हैं, जिनके अधीन महान सिद्धियाँ हैं। किन्तु उस ऐश्वर्य प्रदाता की मुक्तात्माओं, मोक्ष के अभ्यर्थियों और भगवान के भक्तों द्वारा घोर उपेक्षा की जाती है।
 
Among those aspects of Lakshmi is the goddess who controls all material opulence, possessing great powers. Yet, the bestower of that opulence is grossly neglected by liberated souls, aspirants for salvation, and devotees of the Lord.
तात्पर्य
देवी लक्ष्‍मी की अनेक शास्‍त्रों में स्‍तूति की गई है, जिनमें श्रीमद्भागवतम् (10.38.8) शामिल है:

यदरचितं ब्रह्मा-भवदिभिः सुरैः

श्रया च देव्या मुनिभिः सा-सात्वतैः

"भगवान के चरण कमलों की पूजा ब्रह्मा, शिव और अन्य सभी देवताओं के द्वारा, देवी लक्ष्‍मी के द्वारा और महान ऋषियों और वैष्‍णवों के द्वारा की जाती है।" ऐसे वक्‍तव्‍य बताते हैं कि सर्वोच्‍च भगवान के उपासकों के बीच उनकी मुक्‍त ऋषियों और पवित्र वैष्‍णवों से भी अधिक इज्‍जत की जाती है। फिर क्‍यों कभी-कभी उनकी भौतिक और नीची के रूप में आलोचना की जाती है? इस श्‍लोक और अगले श्‍लोक में, नारद इस शंका का समाधान करते हैं। देवी लक्ष्‍मी के कई विस्‍तारों में से, एक लक्ष्‍मी हैं, जो भौतिक संसार के सभी ऐश्‍वर्यों की अध्‍यक्ष हैं। ब्रह्‍मांड के सभी निवासी, विभिन्‍न ग्रहों के शासकों सहित, अपनी शक्तियां उन्‍हें से ऋणी हैं। यहां तक कि योगियों की रहस्‍यमयी सिद्धियां भी उनसे आती हैं। मुमुक्षु (मुक्ति के लिए संघर्षरत व्‍यक्ति) और मुक्‍त (जो लोग पहले ही मुक्ति प्राप्‍त कर चुके हैं) लक्ष्‍मी के इस खास स्‍वरूप की अवहेलना करते हैं क्‍योंकि वह जो ऐश्‍वर्य प्रदान करती हैं, वह इंद्रियों की संतुष्टि के लिए प्रयोजन से अधिक कुछ नहीं होता है, जो कि सच्‍चे मुमुक्षुओं और मुक्‍तों के लिए बिल्‍कुल भी आकर्षक नहीं है। सांसारिक इंद्रिय सुखों में उलझना मुक्ति की प्रमुख बाधा है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)