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श्लोक 2.4.165  |
दुर्वितर्क्या हि सा शक्तिर्
अद्भुता पारमेश्वरी
किन्त्व् अस्यैकान्त-भक्तेषु
गूढं किञ्चिन् न तिष्ठति |
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| अनुवाद |
| परम नियन्ता की अद्भुत शक्ति अकल्पनीय है, किन्तु उनके अनन्य भक्तों से कुछ भी छिपा नहीं रह सकता। |
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| The awesome power of the Supreme Controller is unimaginable, but nothing can remain hidden from His exclusive devotees. |
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