श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 4: वैकुण्ठ (आध्यात्मिक जगत)  »  श्लोक 163
 
 
श्लोक  2.4.163 
एको वैकुण्ठ-नाथो ’यं
श्री-कृष्णस् तत्र तत्र हि
तत्-तत्-सेवक-हर्षाय
तत्-तद्-रूपादिना वसेत्
 
 
अनुवाद
वैकुण्ठ के स्वामी भगवान श्रीकृष्ण अपने समस्त सेवकों को प्रसन्न करने के लिए विभिन्न स्थानों पर निवास करते हैं तथा अनेक रूपों में प्रकट होते हैं।
 
Lord Sri Krishna, the Lord of Vaikuntha, resides in various places and appears in many forms to please all his devotees.
तात्पर्य
भगवान के असंख्य भक्तों को सुख देने के लिए वह असंख्य रूपों में प्रकट होते हैं, यही उनके कई रूपों में अवतार लेने का मूल कारण है। वह धर्म-नंदन जैसे रूप ग्रहण करते हैं और श्री नारद जैसे भक्तों को सुख देने के लिए बदरिकाश्रम जैसे स्थान में विराजमान रहते हैं। और प्रत्यय -आदि (तत्-तद्-रूपादिना में) से यह तात्पर्य है कि वह विभिन्न प्रकार के शारीरिक आभूषणों, लीलाओं आदि का प्रदर्शन करते हैं। नारद वैकुण्ठ के भगवान को इस तरह की महानता देते हैं क्योंकि गोलोक में कृष्ण की तरह भगवान नारायण, अवतारी हैं, विस्तार और अवतार का स्रोत हैं। इस विचार को ध्यान में रखते हुए, नारद इस श्लोक में भगवान नारायण को श्रीकृष्ण नाम से पुकारते हैं। कृष्ण नाम का प्रयोग सूक्ष्म रूप से यह दर्शाता है कि गोलोक में श्रीकृष्ण भगवान के सभी रूपों में सबसे गौरवशाली हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)