श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 4: वैकुण्ठ (आध्यात्मिक जगत)  »  श्लोक 161-162
 
 
श्लोक  2.4.161-162 
एवं विचित्र-देशेषु
स्वप्नादाव् अप्य् अनेकधा
दृश्यमानस्य कृष्णस्य
पार्षदानां पदस्य च

एकत्वम् अप्य् अनेकत्वं
सत्यत्वं च सु-सङ्गतम्
एकस्मिंस् तोषिते रूपे
सर्वं तत् तस्य तुष्यति
 
 
अनुवाद
इस प्रकार यद्यपि कृष्ण, उनके पार्षद और उनका धाम विभिन्न स्थानों, स्वप्नों और चेतना की अन्य विशिष्ट अवस्थाओं में विभिन्न रूपों में देखे जाते हैं, तथापि वे पूर्णतः एकरूप हैं, यद्यपि अनेक हैं, और वे सदैव वास्तविक हैं। जब उनका कोई एक रूप संतुष्ट होता है, तो उनके अन्य सभी रूप भी संतुष्ट हो जाते हैं।
 
Thus, although Krishna, His associates, and His abode are seen in different forms in different places, dreams, and other special states of consciousness, He is absolutely one, though many, and He is always real. When one of His forms is satisfied, all His other forms are also satisfied.
तात्पर्य
यदि कोई अपने किसी रूप में श्रीकृष्ण की आराधना करता है, चाहे वह वैकुण्ठ में निवास करते हों या किसी अन्य निवास में, तो वह उनके सभी विस्तारों को संतुष्ट करता है। इसलिए भगवान के पूर्ण विस्तारों के सभी भक्तों में एक-दूसरे के लिए बहुत स्नेह और सम्मान होता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)