इसलिए यह विविधता किसी वस्तु और उसके प्रतिबिम्ब के बीच के अंतर से उत्पन्न नहीं होती, जैसा कि जल में प्रतिबिम्बित सूर्य के साथ होता है। बल्कि, भगवान के रूप आकाश में अविभाजित एक सूर्य के समान हैं, जो सर्वत्र दिखाई देते हैं, किन्तु विभिन्न स्थानों पर भिन्न-भिन्न रूपों में।
Therefore, this diversity does not arise from the difference between an object and its reflection, as is the case with the sun reflected in water. Rather, the Lord's forms are like the undivided one sun in the sky, visible everywhere, but in different forms at different places.
तात्पर्य
परम प्रभु के प्रकट होने की विविधता को किसी वस्तु और उसके प्रतिबिंब के तर्क से नहीं समझा जा सकता क्योंकि प्रभु के हर रूप शाश्वत और वास्तविक हैं। भौतिक-प्रतिबिंब मॉडल में, केवल एक वस्तु ही शाश्वत और वास्तविक हो सकती है, जो मूल है, अवतारी, प्रभु का वह रूप जिसमें से उनके अन्य रूप विस्तारित होते हैं; प्रभु के सभी अन्य रूप अस्थायी और अवास्तविक होंगे, जैसे मात्र प्रतिबिंब। वास्तव में, प्रभु के विस्तारित व्यक्तिगत रूप भ्रम के उत्पाद होंगे। इसलिए, प्रतिबिंब द्वारा विस्तार करने का सिद्धांत अस्थिर है; अपने सभी रूपों में सर्वोच्च व्यक्ति वही मूल वस्तु है, जो अनंत काल, ज्ञान और आनंद में पूर्ण है। सूर्य विभिन्न जल निकायों में परिलक्षित हो सकता है, या किसी भी वस्तु को कई दर्पणों में परिलक्षित किया जा सकता है। तब अलग-अलग जगहों पर अपनी छवियों के कारण एक कई प्रतीत होता है। परंतु परम प्रभु के अपने रूपों में विविधता ऐसी नहीं है। प्रभु द्वारा दिखाए गए रूपों के लिए, यहाँ उद्धृत अधिक उपयुक्त सादृश्य एक वस्तु का है, सूर्य, जिसे विभिन्न स्थानों में विभिन्न लोगों द्वारा अवलोकन किया जा रहा है। जहाँ से वह खड़ा है, प्रत्येक व्यक्ति सूर्य को आस-पास की वस्तुओं- वृक्षों, पहाड़ियों आदि की पृष्ठभूमि के विरुद्ध भिन्न रूप से प्रकट होते हुए देखता है। इसी प्रकार, सर्वोच्च प्रभु के विविध उपासक उनकी विभिन्न आकृतियों, रंगों और गुणों को अपने व्यक्तिगत उत्स्व भाव के अनुसार देखते हैं। एक भक्त प्रभु को प्रकाश के एक शानदार गोले के रूप में देखता है, दूसरा उसे चार भुजाओं और लाल रंग के साथ देखता है, और फिर भी एक और उसे दो कमल के फूलों की एक जोड़ी पकड़े देखता है। इनमें से कोई भी भिन्न दृश्य भ्रामक नहीं है, क्योंकि ये शुद्ध भक्तों द्वारा अनुभव किए जाते हैं, जिनसे प्रभु को अनावश्यक कारणों से धोखा देने की कोई आवश्यकता नहीं है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥