श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 4: वैकुण्ठ (आध्यात्मिक जगत)  »  श्लोक 155-157
 
 
श्लोक  2.4.155-157 
यथा धरालम्बन-रत्न-भूता
नारायणो ’सौ स नरो ’थ दत्तः
श्री-जामदग्न्यः कपिलादयो ’पि
ये कौतुकाच् च प्रतिमा-सरूपाः

ये स्वर्ग-लोकादिषु विष्णु-यज्ञेश्-
वरादयो ’मी भवतैव दृष्टाः
मत्स्यो ’थ कूर्मश् च महा-वराहः
श्रीमन्-नृसिंहो ननु वामनश् च

अन्ये ’वताराश् च तथैव तेषां
प्रत्य्-एकम् ईहाभिधया प्रभेदाः
ते सच्-चिद्-आनन्द-घना हि सर्वे
नानात्व-भाजो ’पि सदैक-रूपाः
 
 
अनुवाद
पृथ्वी पर भगवान के अपने स्वरूपों में भी वे समान विविधता और समानता दर्शाते हैं। भगवान के अपने रूप पृथ्वी के आश्रय और निधि हैं। इनमें नर-नारायण, दत्तात्रेय, जमदग्निपुत्र पराशर और कपिल शामिल हैं। कुछ ऐसे भी हैं जो लीलापूर्वक देवताओं का रूप धारण करते हैं, और कुछ ऐसे भी हैं, जैसे विष्णु और यज्ञेश्वर, जिन्हें आपने स्वर्गलोक तथा अन्य उच्च लोकों में देखा होगा। मत्स्य, कूर्म, महावराह, श्रीमान नृसिंह और वामन जैसे अनेक अवतार हैं। भगवान के इन प्रत्येक रूपों के अपने-अपने कार्य और नाम हैं, फिर भी ये सभी नित्यता, ज्ञान और आनंद से परिपूर्ण हैं। यद्यपि ये अनेकता प्रकट करते हैं, फिर भी मूलतः ये नित्य एक हैं।
 
The Lord displays this same diversity and similarity in His manifestations on earth. The Lord's manifestations are the earth's refuge and treasure. These include Nara-Narayana, Dattatreya, Jamadagni's son Parashara, and Kapila. There are also some who playfully assume the form of deities, and there are others, such as Vishnu and Yajneshvara, whom you may have seen in heaven and other higher realms. There are numerous incarnations, such as Matsya, Kurma, Mahavaraha, Sriman Narasimha, and Vamana. Each of these manifestations of the Lord has its own function and name, yet they are all filled with eternity, knowledge, and bliss. Although they manifest multiplicity, they are essentially eternally one.
तात्पर्य
परमेश्वर के मुक्त भक्त अध्यात्मिक अस्तित्व की बुनियादी एकता के भीतर विभिन्न प्रकार के व्यक्तित्वों को प्रदर्शित कर सकते हैं क्योंकि उन्हें प्रभु द्वारा अधिकार दिया गया है, जो उनके साथ एक और अनेक होने की अपनी अकल्पनीय क्षमता साझा करते हैं। ईश्वर एक है, लेकिन वह खुद को अनंत विविधता के साथ प्रदर्शित करता है। उनका गोलोक में कृष्ण के रूप में मूल रूप है और वैकुण्ठ में नारायण के रूप में उनका विस्तार है, साथ ही आध्यात्मिक और भौतिक दुनिया में अनगिनत अन्य विस्तार हैं। भौतिक क्षेत्र में उनके अवतारों में उनके देवता रूपों का समावेश है। ब्रह्मांड के विभिन्न कोनों में, वह असंख्य देवताओं के रूप में प्रकट होते हैं, जिनमें से प्रत्येक का अपना रूप और व्यक्तित्व होता है, जैसे कि इलावृत-वर्ष में श्री संकर्षण, पुरुषोत्तम-क्षेत्र में श्री जगन्नाथ और रंग-पुरी में श्री रंगनाथ, बस कुछ का उल्लेख करने के लिए। स्वर्गीय ग्रहों में वह वामन, विष्णु और यज्ञेश्वर जैसे विस्तारों में प्रकट होते हैं। पूरे भौतिक संसार में, वह कई अवतारों में उतरते हैं, कुछ प्रसिद्ध जैसे भगवान मत्स्य और भगवान कूर्म, अन्य कम ज्ञात, जैसे भगवान हयग्रीव और भगवान हंस। इन अवतारों की गतिविधियाँ, नाम और रूप कई गुना हैं, लेकिन वे सभी भगवान के एक ही व्यक्तित्व हैं, जो अविरल अनंत काल, ज्ञान और आनंद में पूर्ण हैं। जैसा कि महा संहिता में कहा गया है:

तस्य सर्ववतारेषु

न विवेशोऽस्ति कश्चन

देही-देहा-विभेदश्च

न पारे विद्यते क्वचित्

सर्वऽवतारा व्याप्ताश्च

सर्व सूक्ष्माच तत्त्वतः

ऐश्वर्य-योगात् भगवान्

क्रीडत्येष जनार्दनः

"भगवान के किसी भी अवतार में कोई अंतर नहीं है, और उनके शरीर और उनकी आत्मा के बीच कोई अंतर नहीं है। सच में, सभी अवतार सर्वव्यापी और असीम सूक्ष्म हैं। इस प्रकार परम व्यक्तित्व जनार्दन अपनी भव्य शक्तियों का उपयोग करके खेलता है।"

बद्रीकाश्रम में भगवान नारायण अपने छोटे भाई नार के साथ धर्म के पुत्र के रूप में प्रकट होते हैं और तपस्वियों के लिए गुरु के रूप में कार्य करते हैं। पाठ 155 में शब्द आदि (कपिलादयः) का तात्पर्य व्यासदेव और धन्वंतरि सहित अन्य अवतारों से है, और पाठ 156 में शब्द आदि (स्वर्ग-लोक आदिषु) का तात्पर्य ब्रह्मलोक पर महर्लोक पर, सत्यलोक पर और ब्रह्मांडीय आवरणों में भगवान के अतिरिक्त प्रकटीकरण स्थानों से है। पृथ्वी और अन्य तत्वों से बना। पाठ 156 में आदि शब्द (विष्णु-यज्ञेश्वर आदि) का दूसरा प्रयोग ब्रह्मलोक पर भगवान महापुरुष और भगवान रूपों, जैसे वराह, की पूजा ब्रह्मांड की आवरणों में की जाती है। गोप-कुमार ने भगवान के इन कई रूपों को देखा है। यहां अलग से उल्लेखित श्री वामन का रूप चार हाथों वाले भगवान विष्णु से अलग है जो स्वर्गलोक पर स्थित देवता हैं।

जैसे हम पुराणों से सीखते हैं, भगवान विष्णु के कई अवतार अलग-अलग समय पर और अलग-अलग परिस्थितियों में एक से अधिक बार प्रकट होते हैं। यह ज्ञात है, उदाहरण के लिए, कि मछली का सबसे बड़ा मत्स्य ब्रह्मांड की विनाशकारी बाढ़ के दौरान वेदों को बचाने के लिए युगों के चक्र के अंत में एक बार प्रकट हुआ था और ब्रह्मांड के निचले हिस्से की आंशिक बाढ़ के दौरान एक बार फिर से सत्यव्रत मुनि पर अपनी दया दिखाने के लिए प्रकट हुआ। दो भगवान कूर्म भी हैं। एक ने अमृत को दूध सागर से मथने के दौरान अपनी पीठ पर मंदरा पर्वत को पकड़ रखा था, और दूसरा हमेशा पृथ्वी को थाम लेता है। इसी तरह, कम से कम पाँच भगवान वराह हैं। निर्माण की शुरुआत में पहला ब्रह्मा के नथुने से प्रकट हुआ, पृथ्वी को उठाया, उसे गर्भ सागर पर रखा और फिर गायब हो गया। दूसरे ने पृथ्वी को आंशिक बाढ़ से बचाया, हिरण्याक्ष को मार डाला और स्वर्गलोक गया। तीसरे, वैदिक यज्ञ के अवतार ने यज्ञ के तरीके सिखाए, पृथ्वी को उठाया, वराह पुराण से उसके बारे में बात की, और अपनी रहस्यमय शक्ति से गायब हो गया। चौथे ने पृथ्वी को लिया और अपने तीखे नुकीले दांतों से अत्यधिक बड़े पहाड़ों को पीसकर उसे समतल किया। पृथ्वी ने तब अपनी पत्नी वराही का रूप धारण किया, उसके साथ आनंद लिया और दो पुत्रों को जन्म दिया। वह भगवान वराह अंत में भगवान नृसिंह के रूप में विलीन होकर गायब हो गए। और अभी तक एक पाँचवाँ वराहदेव पृथ्वी को नीचे से सदा ऊपर रखता है। भगवान नृसिंह ने भी कई अलग-अलग रूप धारण किए, जैसा कि हम बृहत-सहस्र-नाम-स्तोत्र जैसे स्रोतों से जानते हैं। एक नृसिंह ने सभी दिव्य माताओं को हरा दिया, दूसरे ने हिरण्यकश्यपु को चीर दिया, और फिर भी एक ने एक साधारण बिल्ली का रूप धारण किया। दो अलग-अलग असुरों, धुंधु और बाली को धोखा देने के लिए वामनदेव की दो उपस्थितियाँ भी थीं, और भगवान हयग्रीव और भगवान हंस में से प्रत्येक के दो-दो प्रकटीकरण थे।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)