श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 4: वैकुण्ठ (आध्यात्मिक जगत)  »  श्लोक 153
 
 
श्लोक  2.4.153 
ये च लक्ष्मी-पतेर् अष्टा-
क्षरादि-मनु-तत्पराः
ते हि सर्वे स्व-देहान्ते
वैकुण्ठम् इमम् आश्रिताः
 
 
अनुवाद
कुछ भक्तों ने लक्ष्मी पति के लिए अष्टाक्षर मंत्र या किसी अन्य मंत्र के प्रति स्वयं को समर्पित कर दिया और जब उन भक्तों ने अपने भौतिक शरीर त्याग दिए तो उन सभी ने इस वैकुण्ठ की शरण प्राप्त की।
 
Some devotees dedicated themselves to the Ashtakshara Mantra or some other mantra for Lakshmi's husband and when those devotees left their physical bodies they all took refuge in this Vaikuntha.
तात्पर्य
नारायण के भक्त उनके पंच, अष्ट अथवा द्वादश अक्षरों वाले मंत्र का जप करके उनके साहचर्य को प्राप्त कर सकते हैं। श्री पराशर ऋषि विष्णु पुराण (1.6.40) में कहते हैं:

गत्वा गत्वा निवर्तन्ते

चन्द्र-सूर्यादयो ग्रहाः

अद्यापि न निवर्तन्ते

द्वादश अक्षर चिन्तकाः

“चन्द्र, सूर्य और अन्य ग्रह भी बारंबार बनते और नष्ट होते हैं। किन्तु जो व्यक्ति द्वादश अक्षर वाले मंत्र का ध्यान करते हैं उन्हें आज तक भी वापस नहीं लौटना पड़ा है।”

चूँकि भगवान नारायण के सभी मंत्र उनके पवित्र नामों का आवाहन करते हैं, इसलिये यहाँ उल्लिखित द्वादश अक्षर वाले मंत्र से परोक्ष रूप से भगवान के सभी मंत्रों का ही इशारा किया गया है, सिर्फ़ द्वादश अक्षर वाले मंत्र का ही नहीं, वैकुण्ठ को प्राप्त करने के असरदार साधन के रूप में। जो भक्त भगवान की किसी भी मंत्र से पूरे दिल से पूजा करते हैं वे अपने अगले जन्म में उनके आश्रय को प्राप्त करते हैं। और जो भक्तों को आश्रय दिया जाता है, उनमें से जो भक्त भगवान को सर्वोच्च नियंत्रक के रूप में पूजते हैं, वे वैकुण्ठ में उन तक पहुँचते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)