श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 4: वैकुण्ठ (आध्यात्मिक जगत)  »  श्लोक 135
 
 
श्लोक  2.4.135 
ततो ’त्रापि सुखं तत् तद्
अनन्तं परमं महत्
वर्धमानं सदा स्वीय-
मनः-पूरकम् आप्स्यसि
 
 
अनुवाद
तब यहां भी आपका हृदय परम आनंद से भर जाएगा, असीमित और निरंतर बढ़ता हुआ।
 
Then here too your heart will be filled with supreme joy, boundless and ever-increasing.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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