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श्लोक 2.4.135  |
ततो ’त्रापि सुखं तत् तद्
अनन्तं परमं महत्
वर्धमानं सदा स्वीय-
मनः-पूरकम् आप्स्यसि |
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| अनुवाद |
| तब यहां भी आपका हृदय परम आनंद से भर जाएगा, असीमित और निरंतर बढ़ता हुआ। |
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| Then here too your heart will be filled with supreme joy, boundless and ever-increasing. |
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