श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 4: वैकुण्ठ (आध्यात्मिक जगत)  »  श्लोक 133
 
 
श्लोक  2.4.133 
भगवत्-परमैश्वर्य-
प्रान्त-सीमा-प्रकाशने
वैकुण्ठे ’स्मिन् महा-गोप्यः
प्रकटः सम्भवेत् कथम्
 
 
अनुवाद
इस महानतम रहस्य को यहाँ वैकुण्ठ में कैसे प्रकट किया जा सकता है, जहाँ भगवान के सर्वशक्तिमान ऐश्वर्य की चरम सीमा प्रदर्शित होती है?
 
How can this greatest mystery be revealed here in Vaikuntha, where the Lord's omnipotent opulence is displayed in its utmost glory?
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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