श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 4: वैकुण्ठ (आध्यात्मिक जगत)  »  श्लोक 112
 
 
श्लोक  2.4.112 
कदापि तत्रोपवनेषु लीलया
तथा लसन्तं निचितेषु गो-गणैः
पश्याम्य् अमुं कर्ह्य् अपि पूर्व-वत् स्थितं
निजासने स्व-प्रभु-वच् च सर्वथा
 
 
अनुवाद
कभी-कभी वैकुंठ की वाटिकाओं में मैं अपने प्रभु को व्रज की तरह लीला करते हुए देखता, और गौओं के झुंडों से भरे हुए उद्यानों को देखता। कभी-कभी मैं उन्हें अपने सिंहासन पर सदैव की तरह पूर्ण वैभव में विराजमान देखता, किन्तु वे बिल्कुल मेरे प्रभु गोपाल जैसे दिखते।
 
Sometimes I would see my Lord in the gardens of Vaikuntha, playing like in Vraja, and the gardens filled with herds of cows. Sometimes I would see Him seated on His throne, as always, in full splendor, but He looked exactly like my Lord Gopala.
तात्पर्य
कभी-कभी गोप-कुमार भगवान नारायण को वैकुंठ के बगीचों में गाय चराने वाले ग्वाले की भांति अपनी गायों का प्रबंधन करते हुए देखता था। यहाँ तक कि भगवान के भव्य महल के अंदर जहाँ भगवान अपने सबसे अच्छे सिंहासन पर बैठते थे, जहाँ वे लक्ष्मी, धरणी, शेष और गरुड़ जैसे भक्तों से घिरे हुए थे, गोप-कुमार ने कभी-कभी उन्हें अपने पहनावे, दल और अन्य विशेषताओं में श्री मदन-गोपाल की भांति प्रकट होते हुए देखा।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)