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श्लोक 2.4.111  |
तथाप्य् अस्यां व्रज-क्ष्मायां
प्रभुं स-परिवारकम्
विहरन्तं तथा नेक्षे
खिद्यते स्मेति मन्-मनः |
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| अनुवाद |
| फिर भी मेरा मन दुःखी होता, क्योंकि मैं भगवान और उनके साथियों को ब्रज भूमि पर खेलते हुए नहीं देख पाता। |
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| Still my heart was sad because I could not see God and his friends playing on the land of Braj. |
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