श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 4: वैकुण्ठ (आध्यात्मिक जगत)  »  श्लोक 105
 
 
श्लोक  2.4.105 
तेष्व् एव केचिद् अवदन्
दुर्बोधाचरितस्य हि
लीलैका सापि तत् तस्या
न दोषः कीर्तने मतः
 
 
अनुवाद
परन्तु कुछ वैकुण्ठवासियों ने कहा, "भगवान् के अचिन्त्य कार्यों में वे लीलाएँ भी उनकी ही हैं, अतः उनके बारे में कीर्तन करने में कोई दोष नहीं है।"
 
But some residents of Vaikuntha said, "Those pastimes are also among the inconceivable activities of the Lord, so there is no harm in singing about them."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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