श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 4: वैकुण्ठ (आध्यात्मिक जगत)  »  श्लोक 104
 
 
श्लोक  2.4.104 
मायाया वर्णनं चास्य
न भक्तैर् बहु मन्यते
भक्त्य्-आरम्भे हि तद् युक्तं
तेन न स्तूयते प्रभुः
 
 
अनुवाद
"भगवान के भक्तों को उनकी मायावी कथाओं पर ज़रा भी ध्यान नहीं जाता। ऐसी कथाएँ भक्ति साधना के आरंभ में उपयुक्त हो सकती हैं, परन्तु वे वास्तव में भगवान की महिमा नहीं करतीं।"
 
"The Lord's devotees pay no attention to His illusory stories. Such stories may be appropriate at the beginning of devotional practice, but they do not truly glorify the Lord."
तात्पर्य
माया का अर्थ है "भ्रम", "जादू" या "धोखा"। परमेश्वर कभी-कभी ऐसे रूपों को धारण करने का नाटक करके चालें चल सकते हैं जो वास्तव में उनके शाश्वत रूप (स्वरूप) नहीं हैं। उदाहरण के लिए, भगवान विष्णु ने मोहिनी के रूप में खुद को प्रच्छन्न दिखाया, जो सबसे आकर्षक महिला थी, लेकिन वास्तव में, ईश्वर व्यक्तित्व हमेशा पुरुष होता है, कभी स्त्री नहीं। उनके वास्तविक स्त्री समकक्ष की अपनी पहचान है। इसलिए, अच्छी तरह से सूचित वैष्णव भगवान के भ्रामक कार्यों को बहुत गंभीरता से नहीं लेते हैं।

इस तर्क से असंतुष्ट व्यक्ति यह कह सकता है कि भगवान की "भ्रामक" गतिविधियों का वर्णन वास्तव में जानकार वैष्णवों द्वारा सुना और सराहा जाता है। वह भौतिक संसार में सभी वैष्णवों के पहले आध्यात्मिक गुरु, भगवान ब्रह्मा के एक कथन को भी उद्धृत कर सकता है:

मायां वर्णयतोऽमुष्या

ईश्वरस्यनुमोदतः

शृण्वतः श्रद्धया नित्यं

माययात्मा न मुह्यति

"सर्वोच्च भगवान की 'भ्रामक' गतिविधियों को उनकी विभिन्न ऊर्जाओं के साथ वर्णित, सराहा और भगवान की शिक्षाओं के अनुसार सुना जाना चाहिए। यदि यह नियमित रूप से श्रद्धा और सम्मान के साथ किया जाता है, तो व्यक्ति निश्चित रूप से प्रभु की भ्रामक ऊर्जा से बाहर निकल जाता है।" (भागवत 2.7.53)

इस आपत्ति के जवाब में, वैकुंठ-वासी तर्क देते हैं कि भगवान की भ्रामक गतिविधियों का वर्णन केवल भक्ति अभ्यास में शुरुआती लोगों के लिए उपयुक्त है। माया के बारे में इस तरह के वर्णन, पृथ्वी पर गोकुल में उनके लीलाओं सहित, वैकुंठ के सर्वशक्तिमान भगवान का महिमामंडन करने के लिए उपयुक्त नहीं हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)