इस तर्क से असंतुष्ट व्यक्ति यह कह सकता है कि भगवान की "भ्रामक" गतिविधियों का वर्णन वास्तव में जानकार वैष्णवों द्वारा सुना और सराहा जाता है। वह भौतिक संसार में सभी वैष्णवों के पहले आध्यात्मिक गुरु, भगवान ब्रह्मा के एक कथन को भी उद्धृत कर सकता है:
मायां वर्णयतोऽमुष्या
ईश्वरस्यनुमोदतः
शृण्वतः श्रद्धया नित्यं
माययात्मा न मुह्यति
"सर्वोच्च भगवान की 'भ्रामक' गतिविधियों को उनकी विभिन्न ऊर्जाओं के साथ वर्णित, सराहा और भगवान की शिक्षाओं के अनुसार सुना जाना चाहिए। यदि यह नियमित रूप से श्रद्धा और सम्मान के साथ किया जाता है, तो व्यक्ति निश्चित रूप से प्रभु की भ्रामक ऊर्जा से बाहर निकल जाता है।" (भागवत 2.7.53)
इस आपत्ति के जवाब में, वैकुंठ-वासी तर्क देते हैं कि भगवान की भ्रामक गतिविधियों का वर्णन केवल भक्ति अभ्यास में शुरुआती लोगों के लिए उपयुक्त है। माया के बारे में इस तरह के वर्णन, पृथ्वी पर गोकुल में उनके लीलाओं सहित, वैकुंठ के सर्वशक्तिमान भगवान का महिमामंडन करने के लिए उपयुक्त नहीं हैं।
