अध्याय का पहला भाग बताता है कि मथुरा जिले में श्री वृज-भूमि भौतिक ब्रह्मांड के किसी भी अन्य स्थान और यहाँ तक कि मुक्ति के निवास से भी श्रेष्ठ है। जब गोप-कुमार उस धरती पर लौटे जहाँ उनका जन्म हुआ था, तो उन्होंने अपनी आँखों से वृंदावन वन और बाकी वृज-भूमि की विशेष सुंदरता देखी। इस ब्रह्मांड के अंदर या बाहर कहीं और उन्होंने ऐसा वैभव नहीं देखा था। फिर से वृज के विभिन्न वनों में निवास करते हुए, गोप-कुमार इतने मंत्रमुग्ध हो गए कि वह भगवान नारायण के सहयोगियों ने उन्हें वैकुण्ठ के आध्यात्मिक राज्य को प्राप्त करने के बारे में जो कुछ भी बताया था, वह सब भूल गए। इस जिले के नाम मथुरा का तात्पर्य है कि यह मन को मोहित करता है और आंदोलित करता है - शाब्दिक रूप से, "मंथन" (मंथनाति) - हर किसी के मन का जो वहां जाता है।
