श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 4: वैकुण्ठ (आध्यात्मिक जगत)  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  2.4.1 
एकाकिनात्र भ्रमता मयास्या
भूमेः श्रियं कुत्रचिद् अप्य् अदृष्टाम्
सम्पश्यता संवसता वनान्तः
सर्वं विमोहाद् इव विस्मृतं तत्
 
 
अनुवाद
मैं अकेला भटकता रहा, धरती पर एक ऐसा वैभव देखता रहा जो मैंने पहले कभी कहीं नहीं देखा था। एक जंगल में बसेरा बनाकर, मानो किसी विह्वलता में मैं पहले की हर बात भूल गया था।
 
I wandered alone, beholding a splendor I had never seen before on earth. Settling in a forest, I seemed to forget everything before, in a trance.
तात्पर्य
चौथा अध्याय वैकुण्ठ के पारलौकिक वास्तविकता और उसके निवासियों के प्रकटन और गुणों का वर्णन करता है। अध्याय सर्वोच्च भगवान की देवता रूपों की महिमा करता है और वैकुण्ठ से ऊपर अयोध्या की स्थिति और अयोध्या से ऊपर द्वारका की महिमा करता है।

अध्याय का पहला भाग बताता है कि मथुरा जिले में श्री वृज-भूमि भौतिक ब्रह्मांड के किसी भी अन्य स्थान और यहाँ तक कि मुक्ति के निवास से भी श्रेष्ठ है। जब गोप-कुमार उस धरती पर लौटे जहाँ उनका जन्म हुआ था, तो उन्होंने अपनी आँखों से वृंदावन वन और बाकी वृज-भूमि की विशेष सुंदरता देखी। इस ब्रह्मांड के अंदर या बाहर कहीं और उन्होंने ऐसा वैभव नहीं देखा था। फिर से वृज के विभिन्न वनों में निवास करते हुए, गोप-कुमार इतने मंत्रमुग्ध हो गए कि वह भगवान नारायण के सहयोगियों ने उन्हें वैकुण्ठ के आध्यात्मिक राज्य को प्राप्त करने के बारे में जो कुछ भी बताया था, वह सब भूल गए। इस जिले के नाम मथुरा का तात्पर्य है कि यह मन को मोहित करता है और आंदोलित करता है - शाब्दिक रूप से, "मंथन" (मंथनाति) - हर किसी के मन का जो वहां जाता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)