श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 3: भजन (प्रेममय सेवा)  »  श्लोक 96-97
 
 
श्लोक  2.3.96-97 
नित्यापरिच्छिन्न-महा-सुखान्त्य-
काष्ठावतस् तादृश-वैभवस्य
साक्षाद्-रमा-नाथ-पदारविन्द-
क्रीडा-भराजस्र-विभूषितस्य

तत्-प्रेम-भक्तैः सु-लभस्य वक्तुं
वैकुण्ठ-लोकस्य परं किम् ईशे
अद्वैत-दुर्वासनया मुमुक्षा-
विद्धात्मनां हृद्य् अपि दुर्लभस्य
 
 
अनुवाद
वैकुंठलोक के विषय में मैं और क्या कह सकता हूँ? अपने ऐश्वर्य से यह शाश्वत असीम आनंद की चरम सीमा को प्रदर्शित करता है। यह लक्ष्मीपति भगवान के चरणकमलों की सदा-दृश्य लीलाओं से प्रचुर मात्रा में धन्य है। भगवान के प्रेमी भक्त उस वैकुंठ को सहज ही प्राप्त कर लेते हैं, किन्तु पूर्ण एकत्व की भूल और मोक्ष की लालसा से कलंकित मन वाले व्यक्ति स्वप्न में भी उसे प्राप्त करने की आशा नहीं कर सकते।
 
What more can I say about Vaikuntha? With its opulence, it represents the pinnacle of eternal, boundless bliss. It is abundantly blessed with the ever-visible pastimes of the lotus feet of the Lord, the Lord of Lakshmi. Devotees of the Lord easily attain Vaikuntha, but those whose minds are tainted by the mistake of complete oneness and the desire for liberation cannot hope to attain it even in their dreams.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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