श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 3: भजन (प्रेममय सेवा)  »  श्लोक 77
 
 
श्लोक  2.3.77 
सद्य एवागतांस् तत्रा-
द्राक्षं चारु-चतुर्-भुजान्
श्रीमत्-कैशोर-सौन्दर्य-
माधुर्य-विभवाचितान्
 
 
अनुवाद
तभी अचानक मैंने आकर्षक चतुर्भुज पुरुषों के एक समूह को आते देखा, जो यौवन, आकर्षण, सौंदर्य और सौभाग्य के सभी ऐश्वर्यों से सुसज्जित थे।
 
Then suddenly I saw approaching a group of attractive quadrilateral men, adorned with all the luxuries of youth, charm, beauty and good fortune.
तात्पर्य
कुछ परिचारक जो प्रभु शिव के पास गाते थे जब वह नृत्य करते थे, उनकी चार भुजाएँ भी थी, लेकिन नए आए चार-भुजा वाले व्यक्ति असाधारण रूप से सुंदर थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)