श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 3: भजन (प्रेममय सेवा)  »  श्लोक 74
 
 
श्लोक  2.3.74 
तर्ह्य् एव भगवन् दूरे
केषाम् अपि महात्मनाम्
सङ्गीत-ध्वनिर् अत्यन्त-
मधुरः कश्चिद् उद्गतः
 
 
अनुवाद
तभी, महाराज, मैंने दूर से महात्माओं के गायन की अत्यंत मधुर ध्वनि सुनी।
 
Just then, Maharaj, I heard from a distance the very sweet sound of the singing of the Mahatmas.
तात्पर्य
गोपा-कुमार अपने शिष्य को भगवान कहकर बुलाता है, गहरा आदर दिखाते हुए, क्योंकि शिष्य मथुरा ब्राह्मण है और अब उसके पास भगवान मदन-गोपाल की आराधना करने का सर्वोच्च सौभाग्य है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)