श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 3: भजन (प्रेममय सेवा)  »  श्लोक 67
 
 
श्लोक  2.3.67 
ज्ञात्वेमं शिव-लोकस्य
विशेषं सर्वतो ’धिकम्
प्रमोदं परमं प्राप्तो
’प्य् अपूर्णं हृद् अलक्षयम्
 
 
अनुवाद
शिवलोक की इस अद्वितीय उत्कृष्टता के बारे में जानकर मुझे बहुत खुशी हुई। फिर भी, मुझे पता था, मेरा दिल अभी भरा नहीं था।
 
I was overjoyed to learn about the unparalleled excellence of Shivaloka. Yet, I knew my heart was still not satisfied.
तात्पर्य
यह सब सुनकर गोपा-कुमार शिवलोक को देखने के लिए उत्सुक हो गए, परन्तु श्री मदन-गोपाल को पाने की उनकी सतत इच्छा उन्हें रोक रही थी।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)