भवानी-नाथैः स्त्री-गणार्बुद-सहस्रैरवरुध्यमानो भगवतश्चतुर्मूर्तेर्महापुरुषस्य तुरीयां तामसीं मूर्तिं प्रकृतिमात्मनः संकर्षण-संज्ञामआत्म-समाधि-रूपेण सन्निधाप्यैतदभिगृणन् भव उपधावति।
"इलावृत-वर्ष में, भगवान् शिव हमेशा देवी दुर्गा की दस अरब दासी सेवकों से घिरे रहते हैं, जो उनकी सेवा करते हैं। सर्वोच्च भगवान् का चतुष्कोणीय विस्तार वासुदेव, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध और संकर्षण से मिलकर बना है। संकर्षण, चौथा विस्तार, निश्चित रूप से पारलौकिक है, लेकिन भौतिक दुनिया में विनाश के उनके कार्यों के कारण अज्ञान के गुण में हैं, उन्हें तामसी के रूप में जाना जाता है, अज्ञान के गुण में भगवान् का रूप। भगवान् शिव, यह जानते हुए कि उनके अपने अस्तित्व का मूल कारण भगवान् संकर्षण है, हमेशा तप में निम्नलिखित मंत्र का जाप करके संकर्षण का ध्यान करते हैं।"
जैसा कि भगवान् शिव ने पांचवें काँड में अपनी प्रार्थनाओं में कहा है, अनंत शेष के रूप में भगवान् संकर्षण की अभिव्यक्ति में हजारों हुड है। और इसलिए यह रूप अहंकार के आवरण खोल में पूजा जाने वाले भगवान् संकर्षण के रूप से भिन्न है, झूठा अहंकार। भगवान् शिव के निवास में, अहंकार का क्षेत्र, भगवान् संकर्षण में चार भुजाएं हैं, जैसे श्री प्रद्युम्न और अनिरुद्ध। भगवान् शिव का निवास इस प्रकार एक बहुत ही विशेष स्थान है।
