श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 3: भजन (प्रेममय सेवा)  »  श्लोक 66
 
 
श्लोक  2.3.66 
भगवन्तं सहस्रास्यं
शेष-मूर्तिं निज-प्रियम्
नित्यम् अर्चयति प्रेम्णा
दास-वज् जगद्-ईश्वरः
 
 
अनुवाद
यद्यपि वे ब्रह्माण्ड के स्वामी हैं, फिर भी वे सदैव प्रेमपूर्वक अपने प्रिय भगवान शेष की पूजा करते हैं, जो हजार मुख वाले हैं, मानो कोई विनम्र सेवक हों।
 
Although He is the Lord of the universe, He always lovingly worships His beloved Lord Shesha, who has a thousand faces, as if He were a humble servant.
तात्पर्य
भगवान् शिव को भगवान् संकर्षण के अनंत शेष के विस्तार से विशेष लगाव है क्योंकि भगवान् शिव और शेष दोनों ही अज्ञान के गुण के अधीश्वर देवता हैं। यह श्रीमद्-भागवतम (5.17.16) के पांचवे कांड में वर्णित है, जिसमें वर्णन है कि कैसे भगवान् विष्णु की इलावृत-वर्ष में पूजा की जाती है:

भवानी-नाथैः स्त्री-गणार्बुद-सहस्रैरवरुध्यमानो भगवतश्चतुर्मूर्तेर्महापुरुषस्य तुरीयां तामसीं मूर्तिं प्रकृतिमात्मनः संकर्षण-संज्ञामआत्म-समाधि-रूपेण सन्निधाप्यैतदभिगृणन् भव उपधावति।

"इलावृत-वर्ष में, भगवान् शिव हमेशा देवी दुर्गा की दस अरब दासी सेवकों से घिरे रहते हैं, जो उनकी सेवा करते हैं। सर्वोच्च भगवान् का चतुष्कोणीय विस्तार वासुदेव, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध और संकर्षण से मिलकर बना है। संकर्षण, चौथा विस्तार, निश्चित रूप से पारलौकिक है, लेकिन भौतिक दुनिया में विनाश के उनके कार्यों के कारण अज्ञान के गुण में हैं, उन्हें तामसी के रूप में जाना जाता है, अज्ञान के गुण में भगवान् का रूप। भगवान् शिव, यह जानते हुए कि उनके अपने अस्तित्व का मूल कारण भगवान् संकर्षण है, हमेशा तप में निम्नलिखित मंत्र का जाप करके संकर्षण का ध्यान करते हैं।"

जैसा कि भगवान् शिव ने पांचवें काँड में अपनी प्रार्थनाओं में कहा है, अनंत शेष के रूप में भगवान् संकर्षण की अभिव्यक्ति में हजारों हुड है। और इसलिए यह रूप अहंकार के आवरण खोल में पूजा जाने वाले भगवान् संकर्षण के रूप से भिन्न है, झूठा अहंकार। भगवान् शिव के निवास में, अहंकार का क्षेत्र, भगवान् संकर्षण में चार भुजाएं हैं, जैसे श्री प्रद्युम्न और अनिरुद्ध। भगवान् शिव का निवास इस प्रकार एक बहुत ही विशेष स्थान है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)