"अपने मित्र कुबेर की भक्ति से आकर्षित होकर, वे अपनी प्रिय पार्वती और प्रिय सौम्य सखियों के साथ कैलाश पर्वत को अपनी उपस्थिति से सुशोभित करने के लिए यात्रा कर रहे हैं। वे अपने ही ग्रह से आए हैं, स्वयं के समान दिव्य, एक ऐसा निवास जहाँ भक्ति के माध्यम से वे लोग पहुँच सकते हैं जो उन्हें और भगवान कृष्ण को अभिन्न मानते हैं।"
"Attracted by the devotion of His friend Kubera, He is traveling with His beloved Parvati and beloved gentle friends to grace Mount Kailash with His presence. He has come from His own planet, divine as Himself, an abode accessible through devotion to those who consider Him and Lord Krishna to be one and the same."
तात्पर्य
यहाँ नंदीश्वर व्याख्या करते हैं कि भगवान शिव कहाँ से आते हैं और कहाँ जा रहे हैं। भगवान शिव का अपना ग्रह, भौतिक ब्रह्माण्ड के आवरणों से परे, उन लोगों द्वारा प्राप्त किया जा सकता है जो उन्हें और भगवान विष्णु को एक ही स्तर पर पूजते हैं। वह पारलौकिक दुनिया भगवान शिव के आनंद के लिए उपयुक्त है, जो सभी प्रकार के शाश्वत और असीमित वैभव से सुसज्जित है। फिर भी भगवान शिव कैलाश पर्वत के मूल मालिक देवता कुबेर की मित्रता को सहर्ष स्वीकार करते हैं और स्वयं को कुबेर की भक्ति के प्रति समर्पित कर देते हैं। और इसलिए भगवान शिव अपनी पत्नी पार्वती के साथ कैलाश जा रहे हैं। चूँकि ब्रह्मांड की माँ पार्वती, भगवान शिव की सर्वोच्च ऊर्जा हैं, इसलिए गोप-कुमार को उन्हें सार्वजनिक रूप से अपनी गोद में बैठे देखकर हैरान नहीं होना चाहिए। लेकिन भगवान शिव इतने छोटे दल के साथ यात्रा क्यों कर रहे हैं? हालाँकि उनके अपने ग्रह पर उनके कई और भक्त हैं, लेकिन इस यात्रा के लिए उन्होंने केवल अपने करीबी सहयोगियों को चुना है क्योंकि भौतिक दुनिया के भीतर कैलाश उनके कुछ वैभव और दल को ही समायोजित कर सकता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥