| श्री बृहत् भागवतामृत » खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य » अध्याय 3: भजन (प्रेममय सेवा) » श्लोक 46 |
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| | | | श्लोक 2.3.46  | उतास्य तेजो-मय-पूरुषस्य
चिरावलोकेन विवर्धितो ’भूत्
निजेष्ट-सन्दर्शन-दीर्घ-लोभः
स्मृतेः सृतिं नीत इव प्रकर्षात् | | | | | | अनुवाद | | बल्कि, जैसे-जैसे मैं उन तेजस्वी भगवान महाकाल को देखता गया, मेरी पूजा के पात्र को देखने की मेरी चिरकाल से चली आ रही लालसा उतनी ही प्रबल होती गई। जिस देवता की मैं पूजा करता था, वह मानो बलपूर्वक मेरे स्मरण पथ पर खिंचे चले आ रहे थे। | | | | Rather, as I gazed at the radiant Lord Mahakala, my long-held desire to see the object of my worship grew stronger. It was as if the deity I worshipped was being forcibly drawn into my memory. | | ✨ ai-generated | | |
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