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श्लोक 2.3.44  |
पद-स्वाभाविकानन्द-
तरङ्ग-क्षोभ-विह्वले
चित्ते तद्-अन्य-स्व-प्राप्य-
ज्ञानम् अन्तर्दधाव् इव |
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| अनुवाद |
| उस निवास के अंतर्निहित परमानंद की लहरों से उछलकर मेरा मन अभिभूत हो गया, मानो मेरे लक्ष्य के प्रति जागरूकता लुप्त हो गई हो। |
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| My mind was overwhelmed by the waves of bliss inherent in that abode, as if the awareness of my goal had vanished. |
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