श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 3: भजन (प्रेममय सेवा)  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  2.3.44 
पद-स्वाभाविकानन्द-
तरङ्ग-क्षोभ-विह्वले
चित्ते तद्-अन्य-स्व-प्राप्य-
ज्ञानम् अन्तर्दधाव् इव
 
 
अनुवाद
उस निवास के अंतर्निहित परमानंद की लहरों से उछलकर मेरा मन अभिभूत हो गया, मानो मेरे लक्ष्य के प्रति जागरूकता लुप्त हो गई हो।
 
My mind was overwhelmed by the waves of bliss inherent in that abode, as if the awareness of my goal had vanished.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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