श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 3: भजन (प्रेममय सेवा)  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  2.3.42 
इत्थम् आनन्द-सन्दोहम्
अनुविन्दन् निमग्न-धीः
आत्माराम इवाभूवं
पूर्ण-काम इवाथ वा
 
 
अनुवाद
इस प्रकार प्राप्त परमानंद का विशाल भंडार मेरे मन में उमड़ पड़ा। मैं एक आत्म-संतुष्ट ऋषि या ऐसे व्यक्ति के समान हो गया जिसकी सभी महत्वाकांक्षाएँ पूरी हो गई हों।
 
The immense store of bliss thus attained overflowed into my mind. I became like a self-satisfied sage or a person whose ambitions have been fulfilled.
तात्पर्य
गोप-कुमार एक आत्म-तृप्त संत या भौतिकवादी की तरह हो गए, वास्तव में वह एक भी नहीं थे। यदि वे वास्तव में अपने और अपनी स्थिति से संतुष्ट होते, तो अब वे अपने भगवान की पूजा करने के लिए लालायित नहीं होते।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)