|
| |
| |
श्लोक 2.3.40  |
कदापि तस्मिन्न् एवाहं
लीयमानो ’नुकम्पया
रक्षेय निज-पादाब्ज-
नखांशु-स्पर्शतो ’मुना |
| |
| |
| अनुवाद |
| कभी-कभी मैं भगवान के तेज में विलीन होने लगता था, किन्तु वे कृपा करके अपने चरणकमलों की किरणों के स्पर्श से मुझे बचा लेते थे। |
| |
| Sometimes I was about to merge into the Lord's radiance, but He would kindly save me by touching the rays of His lotus feet. |
| ✨ ai-generated |
| |
|