श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 3: भजन (प्रेममय सेवा)  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  2.3.38 
नैतन् निश्चेतुम् ईशे ’यं
दृग्भ्यां चित्तेन वेक्ष्यते
किं वातिक्रम्य तत् सर्वम्
आत्म-भावेन केनचित्
 
 
अनुवाद
मैं यह समझने में असमर्थ था कि मैं उसे अपनी आंखों से देख रहा था, अपने मन से, या अपनी आत्मा की शक्ति से जो इन दोनों से परे थी।
 
I was unable to understand whether I was seeing him with my eyes, my mind, or the power of my soul which was beyond both.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)