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श्लोक 2.3.37  |
यद्य् अपि स्व-प्रकाशो ’साव्
अतीतेन्द्रिय-वृत्तिकः
तत्-कारुण्य-प्रभावेण
परं साक्षात् समीक्ष्यते |
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| अनुवाद |
| वह स्वयंभू प्रभु इन्द्रियों की पहुँच से परे है, परन्तु उसकी कृपा के बल से ही उसे प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। इसके अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है। |
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| The Self-existent Lord is beyond the reach of the senses, but He can be seen directly only by His grace. There is no other way. |
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