श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 3: भजन (प्रेममय सेवा)  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  2.3.37 
यद्य् अपि स्व-प्रकाशो ’साव्
अतीतेन्द्रिय-वृत्तिकः
तत्-कारुण्य-प्रभावेण
परं साक्षात् समीक्ष्यते
 
 
अनुवाद
वह स्वयंभू प्रभु इन्द्रियों की पहुँच से परे है, परन्तु उसकी कृपा के बल से ही उसे प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। इसके अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है।
 
The Self-existent Lord is beyond the reach of the senses, but He can be seen directly only by His grace. There is no other way.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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