श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 3: भजन (प्रेममय सेवा)  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  2.3.30 
प्राधानिकैर् जीव-सङ्घैर्
भुज्यमानं मनो-रमम्
सर्वतः सर्व-माहात्म्या-
धिक्येन विलसत् स्वयम्
 
 
अनुवाद
वह स्थान अत्यंत उत्तम आश्चर्यों से युक्त था, वह अपने आप में चमक रहा था, उसमें असंख्य जीव आनन्द ले रहे थे, उनके शरीर आदिम पदार्थ से बने थे।
 
The place was full of exquisite wonders, it shone in itself, countless creatures were enjoying themselves in it, their bodies were made of primitive matter.
तात्पर्य
प्रधान सबसे सूक्ष्म भौतिक ऊर्जा है, जिससे अन्य सभी सूक्ष्म और स्थूल रूप प्रकट होते हैं। गोपा-कुमार ने जिन प्राणियों को देखा, उनके शरीर प्रधान के थे, जो कि प्रकट सृष्टि के सीमित नामों और रूपों से परे थे। प्रधान आध्यात्मिक वास्तविकता को बंधी हुई आत्माओं से छुपाती है, लेकिन फिर भी यहाँ उसका वर्णन आत्म-चमकदार (विलासट स्वयं) के रूप में किया गया है क्योंकि जब बंधी हुई आत्माएँ पारलौकिक ज्ञान से प्रबुद्ध होती हैं तो उसका अंधेरा आध्यात्मिक तेज में विलीन हो जाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)