परम भगवान निश्चित ही अपनी पारलौकिक आकृति से कुछ ज्यादा ही प्रिय समझ सकते हैं। उदाहरण के लिए, श्रीमद भागवत (11.14.15) में कृष्ण ने उद्धव को बताया:
न तथा मे प्रिय तम
आत्म योनिर ना शंकरः
न च संकर्षणो न श्री
नैवात्मा च यथा भवान
"न तो भगवान ब्रह्मा, न भगवान शिव, न भगवान संकर्षण, न भाग्य की देवी और न ही मेरा अपना स्वयं का अस्तित्व मेरे लिए उतना प्रिय है जितना आप है।"
भगवान का पवित्र नाम अतुलनीय है; कुछ भी उसका बराबर या उससे ऊपर नहीं जा सकता। दुनिया की भलाई के लिए भगवान का पवित्र नाम उनके द्वारा दिया गया वरदान है, जो सबको लाभकारी है - चाहे वो ठीक तरह से योग्य हो या नहीं - जो अपनी किसी भी इंद्रियों से उसकी सेवा करता है। इसकी पूजा आसान है, बस इसके लिए जुबान के अग्रभाग को कुछ हिलाना होता है। और यह सा रस "रस से भरा" है, एक ऐसा शब्द है जिसे कई तरह से समझा जा सकता है।
स रस का मतलब "बहुत कोमल" हो सकता है, क्योंकि पवित्र नाम मधुर ध्वनि वाले शब्दांशों से मिलकर बना है। इसका मतलब "शुद्ध आध्यात्मिक पदार्थ, सत चित आनंद" से मिलकर बना भी हो सकता है। या इसका मतलब यह हो सकता है कि पवित्र नाम विभिन्न प्रकार के भक्तिपूर्ण संबंधों के साथ होता है, नौ रस, जिनकी शुरुआत श्रंगार (माधुर्य रस) से होती है। पवित्र नाम का शुद्ध उच्चारण करने में, प्रेम रस के ये सभी प्रकार साकार होते हैं, चाहे वो अलग होने (विरह) या मिलन (संग) के मूड में हों। रस का मतलब "कृष्ण के प्रति आकर्षण" (राग) भी होता है, जिसे संकीर्तन करने वाले भक्त अनुभव करते हैं क्योंकि उनके कृष्ण प्रेम को पवित्र नाम द्वारा तीव्रता से जागृत किया जाता है। दूसरे शब्दों में, भगवान की संकीर्तन उनके सेवकों और सब को भगवान के प्रति आकर्षित होने के लिए प्रेरित करता है।
रस का मतलब "विशेष शक्ति" (वीर्य विशेष) भी होता है; पवित्र नामों का उच्चारण करना बेहद शक्तिशाली होता है। और रस का मतलब "असाधारण गुणवत्ता" (गुण विशेष) भी होता है, जो वर्तमान संदर्भ में यह बताता है कि नाम संकीर्तन में दुनिया के सबसे गिरे हुए लोगों को उबारने की शक्ति होती है। रस का मतलब "असाधारण खुशी" (सुख विशेष) भी होता है; हरि नम खुशी का सबसे ज्यादा केंद्रित सार है। और इसका मतलब "असाधारण सुंदरता" (माधुर्य विशेष) भी होता है। नाम संकीर्तन अक्सर अपनी सुंदरता के लिए गौरवांवित किया जाता है, जैसे स्कंद पुराण के प्रभास खंड के इस प्रसिद्ध छंद में:
मधुरा मधुरम एतं मंगलं मंगलानां
सकल निगम वल्ली सत्त फलं चित् स्वरूपम
सकृद अपि परिगीतं श्रद्धया हेलाया वा
भुर्गु वर नर मात्रं तारयेत् कृष्ण नाम
"हे भुर्गु वंश के सर्वोत्तम, कृष्ण का पवित्र नाम सबसे मीठे में मीठा, सबसे शुभ में शुभ है। यह सभी वेदों का पारलौकिक फल है, बिलकुल आध्यात्मिक है। जो भी इसका एक बार भी पाठ करता है, चाहे विश्वास के साथ या उपेक्षा के साथ, उसका उद्धार हो जाता है।"
इस छंद की व्याख्या करने के लिए रस शब्द के कई सारे मतलब लागू किए जा सकते हैं, लेकिन ऊपर दिए गए उदाहरण संकीर्तन की महानता की कम से कम कुछ समझ तो देते ही हैं।
