श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 3: भजन (प्रेममय सेवा)  »  श्लोक 184
 
 
श्लोक  2.3.184 
श्रीमन्-नाम प्रभोस् तस्य
श्री-मूर्तेर् अप्य् अति-प्रियम्
जगद्-धितं सुखोपास्यं
स-रसं तत्-समं न हि
 
 
अनुवाद
भगवान को अपने सुंदर रूप से भी अधिक प्रिय, उनका सहज पूजनीय पवित्र नाम समस्त जगत को कल्याणकारी है। वस्तुतः, भगवान के पवित्र नाम के समान अमृतमय कोई भी वस्तु नहीं है।
 
Even more dear to the Lord than His beautiful form, His easily worshipable holy name is beneficial to the entire universe. Indeed, there is nothing as nectar-like as the holy name of the Lord.
तात्पर्य
निष्कर्ष के तौर पर, वैकुण्ठ दूत कहते हैं कि श्री भगवान नाम संकीर्तन की महिमा गाते हुए वह प्रत्येक अवसर का लाभ उठाते हैं। संकीर्तन बिलकुल आकर्षक है, सारी शक्ति, सुंदरता और समृद्धि से परिपूर्ण है। यह अपने प्रभावशाली प्रभाव को हर किसी के ऊपर, किसी भी जगह और कभी भी डालता है। स्वयं वैकुण्ठ के भगवान अपने पवित्र नाम की ओर अपने सर्वोच्च सौंदर्य की ओर से अधिक आकर्षित होते हैं।

परम भगवान निश्चित ही अपनी पारलौकिक आकृति से कुछ ज्यादा ही प्रिय समझ सकते हैं। उदाहरण के लिए, श्रीमद भागवत (11.14.15) में कृष्ण ने उद्धव को बताया:

न तथा मे प्रिय तम

आत्म योनिर ना शंकरः

न च संकर्षणो न श्री

नैवात्मा च यथा भवान

"न तो भगवान ब्रह्मा, न भगवान शिव, न भगवान संकर्षण, न भाग्य की देवी और न ही मेरा अपना स्वयं का अस्तित्व मेरे लिए उतना प्रिय है जितना आप है।"

भगवान का पवित्र नाम अतुलनीय है; कुछ भी उसका बराबर या उससे ऊपर नहीं जा सकता। दुनिया की भलाई के लिए भगवान का पवित्र नाम उनके द्वारा दिया गया वरदान है, जो सबको लाभकारी है - चाहे वो ठीक तरह से योग्य हो या नहीं - जो अपनी किसी भी इंद्रियों से उसकी सेवा करता है। इसकी पूजा आसान है, बस इसके लिए जुबान के अग्रभाग को कुछ हिलाना होता है। और यह सा रस "रस से भरा" है, एक ऐसा शब्द है जिसे कई तरह से समझा जा सकता है।

स रस का मतलब "बहुत कोमल" हो सकता है, क्योंकि पवित्र नाम मधुर ध्वनि वाले शब्दांशों से मिलकर बना है। इसका मतलब "शुद्ध आध्यात्मिक पदार्थ, सत चित आनंद" से मिलकर बना भी हो सकता है। या इसका मतलब यह हो सकता है कि पवित्र नाम विभिन्न प्रकार के भक्तिपूर्ण संबंधों के साथ होता है, नौ रस, जिनकी शुरुआत श्रंगार (माधुर्य रस) से होती है। पवित्र नाम का शुद्ध उच्चारण करने में, प्रेम रस के ये सभी प्रकार साकार होते हैं, चाहे वो अलग होने (विरह) या मिलन (संग) के मूड में हों। रस का मतलब "कृष्ण के प्रति आकर्षण" (राग) भी होता है, जिसे संकीर्तन करने वाले भक्त अनुभव करते हैं क्योंकि उनके कृष्ण प्रेम को पवित्र नाम द्वारा तीव्रता से जागृत किया जाता है। दूसरे शब्दों में, भगवान की संकीर्तन उनके सेवकों और सब को भगवान के प्रति आकर्षित होने के लिए प्रेरित करता है।

रस का मतलब "विशेष शक्ति" (वीर्य विशेष) भी होता है; पवित्र नामों का उच्चारण करना बेहद शक्तिशाली होता है। और रस का मतलब "असाधारण गुणवत्ता" (गुण विशेष) भी होता है, जो वर्तमान संदर्भ में यह बताता है कि नाम संकीर्तन में दुनिया के सबसे गिरे हुए लोगों को उबारने की शक्ति होती है। रस का मतलब "असाधारण खुशी" (सुख विशेष) भी होता है; हरि नम खुशी का सबसे ज्यादा केंद्रित सार है। और इसका मतलब "असाधारण सुंदरता" (माधुर्य विशेष) भी होता है। नाम संकीर्तन अक्सर अपनी सुंदरता के लिए गौरवांवित किया जाता है, जैसे स्कंद पुराण के प्रभास खंड के इस प्रसिद्ध छंद में:

मधुरा मधुरम एतं मंगलं मंगलानां

सकल निगम वल्ली सत्त फलं चित् स्वरूपम

सकृद अपि परिगीतं श्रद्धया हेलाया वा

भुर्गु वर नर मात्रं तारयेत् कृष्ण नाम

"हे भुर्गु वंश के सर्वोत्तम, कृष्ण का पवित्र नाम सबसे मीठे में मीठा, सबसे शुभ में शुभ है। यह सभी वेदों का पारलौकिक फल है, बिलकुल आध्यात्मिक है। जो भी इसका एक बार भी पाठ करता है, चाहे विश्वास के साथ या उपेक्षा के साथ, उसका उद्धार हो जाता है।"

इस छंद की व्याख्या करने के लिए रस शब्द के कई सारे मतलब लागू किए जा सकते हैं, लेकिन ऊपर दिए गए उदाहरण संकीर्तन की महानता की कम से कम कुछ समझ तो देते ही हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)