श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 3: भजन (प्रेममय सेवा)  »  श्लोक 182
 
 
श्लोक  2.3.182 
कृष्णस्य साक्षाद् अपि जायते यत्
केषाञ्चिद् अक्षि-द्वय-मीलनादि
ध्यानं न तत् किन्तु मुदां भरेण
कम्पादि-वत् प्रेम-विकार एषः
 
 
अनुवाद
जब कुछ भक्त, कृष्ण के साक्षात् दर्शन करते हुए भी, अपनी आँखें बंद कर लेते हैं और मन में विलीन हो जाते हैं, तो यह ध्यान प्रतीत हो सकता है, लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है। बल्कि, यह अत्यधिक आनंद से उत्पन्न एक परिवर्तन है, जैसे शुद्ध प्रेम में लीन भक्तों में कंपन और अन्य परमानंद के लक्षण।
 
When some devotees, even while having a direct vision of Krishna, close their eyes and become absorbed in the mind, this may appear to be meditation, but it is not. Rather, it is a transformation caused by extreme joy, similar to the vibrations and other ecstatic symptoms experienced by devotees absorbed in pure love.
तात्पर्य
यह छंद संभावित आपत्ति का उत्तर देता है कि जब सनक-कुमार और उनके भाइयों ने वैकुंठ के भगवान से मुलाकात की तो वे ध्यान की समाधि में चले गए। जैसा कि श्रीमद्-भागवतम (3.15.44) के तीसरे कैंटो में मैत्रेय मुनि द्वारा वर्णित है:

ते वा अमुष्या वदनासित-पद्म-कोशं

उद्वीक्ष्य सुंदरतराधर-कुंड-हासं

लब्धाशिष: पुनर अवेक्ष्य तदीयं अँघ्रि-

द्वंद्वं नखारुण-मणि-श्रयणं निदध्यू:

"भगवान का सुंदर चेहरा उन्हें अंदर से एक नीले कमल की तरह दिखाई दिया, और भगवान की मुस्कुराहट एक खिले हुए चमेली के फूल की तरह दिखाई दी। भगवान के चेहरे को देखने के बाद, ऋषि पूरी तरह से संतुष्ट थे, और जब वे उन्हें और देखना चाहते थे तो उन्होंने उनके चरण कमलों के नाखूनों को देखा, जो माणिक्य के समान थे। इस प्रकार उन्होंने भगवान के दिव्य शरीर को बार-बार देखा, और इसलिए वे अंततः भगवान के व्यक्तिगत स्वरूप पर ध्यान प्राप्त कर सके।"

इस श्लोक में निध्यै क्रिया से शब्द निदध्यू: का अर्थ है "गहराई से ध्यान करना", यह इंगित करता है कि जब कुमारों ने भगवान को देखा तो वे ध्यानपूर्ण चिंतन में निष्क्रिय रूप से वापस चले गए। लेकिन जैसा कि वैकुंठ-दूत बताते हैं, हमें केवल इन लक्षणों की बाहरी आकृति से निर्णय नहीं लेना चाहिए। आँखें बंद करना और शारीरिक हलचलों को रोकना ध्यान की समाधि के संकेत नहीं हैं; वे इसके बजाय भवों, भक्ति के उल्लास की शारीरिक अभिव्यक्तियाँ हो सकते हैं, जो उल्लास के अन्य शारीरिक संकेतों जैसे कंपकंपी, पसीना और शरीर के बालों के खड़े होने के समान हैं। मैत्रेय मुनि ने कुमारों के उल्लास को "ध्यान" के रूप में वर्णित किया क्योंकि यह केवल बाहरी रूप से ऐसा लगता था। इसलिए अपनी आँखों से सीधे भगवान को देखने की श्रेष्ठता अपराजित है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)