यद्यपि भगवान् के दर्शन का उद्गम ज्ञान-चक्षु से होता है, फिर भी व्यक्ति सोच सकता है, "मैं उन्हें अपनी दोनों आँखों से देख रहा हूँ।" यह केवल कृष्ण की कृपा की शक्ति को इंगित करता है, जिसके द्वारा भक्त को अपने विशेष आनन्द का अनुभव होता है।
Although the vision of the Lord originates from the eye of knowledge, one may still think, "I see Him with both my eyes." This simply indicates the power of Krishna's grace, by which the devotee experiences His special bliss.
तात्पर्य
कुछ कम भावुक चिंतक पीपलायन से तर्क करेंगे कि सर्वोच्च भगवान को केवल ज्ञान की आँखों से ही देखा जा सकता है, बाहरी इंद्रियों से नहीं। अगर सर्वोच्च भौतिक दृष्टि का विषय होते, तो वे कहेंगे, वह आध्यात्मिक रूप से स्वयं में प्रकट नहीं हो सकता था। पीपलायन जवाब देंगे कि अगर यह सच भी है, तो विशेष परमानंद केवल उसी को उपलब्ध होता है जो मानता है कि वह अपने सामने भगवान को देखता है। और भले ही भक्त केवल कल्पना ही करते हों कि वे परमेश्वर के व्यक्तित्व को अपनी आँखों से देख रहे हैं, फिर भी उनके द्वारा अनुभव किया गया परमानंद वास्तविक है। वह परमानंद ही इस बात का प्रमाण है कि भगवान की विशेष कृपा की शक्ति उन पर उतर आई है, जिससे वे विस्मय से प्रसन्न होकर कहते हैं: "सर्वोच्च को देखना असंभव है, लेकिन अब मैं उन्हें अपने सामने देख रहा हूं!"
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥