श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 3: भजन (प्रेममय सेवा)  »  श्लोक 174
 
 
श्लोक  2.3.174 
श्री-कृष्ण-चन्द्रस्य महानुकम्पा-
स्माभिः स्थिरा त्वय्य् अवधारितास्ति
लीना न साक्षाद्-भगवद्-दिदृक्षा
त्वत्तस् तपो-लोक-निवासि-वाक्यैः
 
 
अनुवाद
हमने पाया है कि श्रीकृष्णचन्द्र की महानतम कृपा आपमें दृढ़तापूर्वक स्थापित है, क्योंकि तपोलोकवासियों के तर्क भी साक्षात् भगवान् के दर्शन की आपकी उत्सुकता को नष्ट नहीं कर सके।
 
We have found that the greatest grace of Sri Krishnachandra is firmly established in you, because even the arguments of the people of Tapolok could not destroy your eagerness to see the Lord in person.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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