दुःसङ्ग-दोषं भरतादयो यथा
दुर्द्यूत-दोषं च युधिष्ठिरादयः
ब्रह्म-स्व-भीतिं च नृगादयो ’मलाः
प्रादर्शयन् स्व-व्यवहारतो जनान्
अनुवाद
जिस प्रकार भरत आदि ने कुसंगति के दोष, युधिष्ठिर आदि ने जुए के दोष, तथा नृग आदि ने ब्राह्मण की सम्पत्ति छीन लेने से उत्पन्न भय के बारे में बताया, उसी प्रकार शुद्धात्माएँ सामान्यतः अपने आचरण से लोगों को शिक्षा देती हैं।
Just as Bharata and others spoke about the evils of bad company, Yudhishthira and others spoke about the evils of gambling, and Nriga and others spoke about the fear caused by the seizure of a Brahmin's property, similarly pure souls generally teach people through their conduct.
तात्पर्य
भारत महाराज ने अपने स्वयं के जीवन से गलत संगति के खतरे को दर्शाया। हालाँकि वे लगभग पूर्ण रूप से समर्पित और त्यागी थे, वे एक नवजात हिरण की देखभाल में विचलित हो गए और इसलिए उन्हें हिरण के रूप में जन्म लेना पड़ा। इसी तरह का एक मामला सौभरी ऋषि का है, जो सेक्स में लिप्त दो मछलियों को देखकर ध्यान से विचलित हो गए थे। वैकुंठ-दूतों की राय में, हालाँकि, वास्तव में ये ऊंची आत्माएँ निष्कलंक थीं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥